राम प्रसाद बिस्मिल जयंती: फांसी के वक्त रोते बेटे से मां ने कहा, जिसके नाम से ब्रिटिश सरकार भय से कांप उठती है, वो मौत से कैसे डर सकता है?

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) को भागने का एक मौका और मिला। उन्हें बाहर ले जाया जा रहा था। एक सिपाही भी साथ में था। दूसरे सिपाही ने कहा- “उसे जंजीर से बाँध दो।” मगर सिपाही ने बड़े विश्वास से उत्तर दिया- “मुझे इन पर पूरा भरोसा है। ये भागेंगे नहीं।”

रामप्रसाद बिस्मिल Ram Prasad Bismil

राम प्रसाद बिस्मिल. (जन्म: 11 जून, 1897 – मृत्यु: 19 दिसंबर, 1927)

Remembering Ram Prasad Bismil: 18 दिसम्बर 1927 का वह दिन। गोरखपुर सेंट्रल जेल के बड़े फाटक के सामने अधेड़ आयु की एक महिला इंतजार में खड़ी थी। उसके चेहरे पर कुछ उदासी छाई थी। चिंता भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वह इसी सोच में थी कि उसे कब जेल के अन्दर जाने की आज्ञा मिलती है।

इसी बीच महिला के पति भी वहां आ गए। पत्नी को पहले ही वहां आया देख, वे चकित से रह गये। वे भी पत्नी के पास ही बैठ गए और अब दोनों भीतर जाने के लिए बुलाए जाने की प्रतिक्षा करने लगे। एक युवक भी वहां पहुंच गया। वह इनका रिश्तेदार नहीं था मगर वह जानता था कि इन दोनों को अन्दर प्रवेश करने की अनुमति मिल जाएगी। वह अपने बारे में सोच रहा था कि वह स्वयं कैसे भीतर जा सकेगा।

जेल के अफसर वहां आए। उन्होंने पति-पत्नी दोनों को बुलाया। वहीं खड़ा युवक भी उनके पीछे-पीछे जाने लगा। पहरेदार ने उसे रोक दिया और कड़क कर पूछा- “तुम कौन हो ?” महिला ने अनुरोध के स्वर में कहा- “भैया, उसे भी अन्दर आने दो। वह मेरा भान्जा है।” पहरेदार ने युवक को भी उनके साथ जाने दिया।

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तीनों व्यक्ति जेल में एक ऐसे स्वतंत्रता सैनिक से मिलने जा रहे थे, जिसे सुबह फांसी की सजा दी जाने वाली थी। बेड़ियां पहने उस स्वतंत्रता सेनानी को वहां लाया गया। हथकड़ी-बेड़ियां उसके शरीर पर आभूषण जैसी दिखाई दे रही थीं। वह अन्तिम बार अपनी मां को देख रहा था। वह सोच रहा था कि अब मैं आखिरी बार उसे ‘मां’ कहकर पुकार सकूंगा। उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। एकाएक उसकी आंखों से आंसू निकलकर गालों पर बहने लगे।

उसकी मां ने दृढ़ता के स्वर में कहा-“मेरे बेटे, यह तुम क्या कर रहे हो? मैं तो अपने सपूत को एक महान योद्धा मानती हूं। मैं सोचती थी कि मेरे बेटे का नाम सुनते ही ब्रिटिश सरकार भय से कांप उठती है। मुझे यह मालूम नहीं था कि मेरा बेटा मौत से डरता है। यदि तुम रोते हुए ही मौत का सामना करना चाहते हो तो तुमने आजादी की लड़ाई में हिस्सा ही क्यों लिया?’

वीर माता की देशभक्ति और दृढ़ता देखकर जेल के अफसर भी चकित रह गए। उस वीर स्वाधीनता सेनानी ने कहा-“मां, ये आंसू भय के आंसू नहीं हैं। ये हर्ष के आंसू हैं-तुम जैसी वीर माता को पाने की खुशी के हैं ये आंसू।” उस वीर माता के वीर पुत्र का नाम था राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil)। वे प्रसिद्ध काकोरी रेल डकैती प्रकरण के अगुआ थे। इस तरह यह भेंट खत्म हुई।

दूसरी सुबह राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) रोज की तुलना में कुछ जल्दी जगे। स्नान के बाद उसने सुबह की प्रार्थना की। अपनी मां को उसने अन्तिम पत्र लिखा और फिर वह मौत की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठ गया। अफसर वहां आए। उन्होंने राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) की बेड़ियां काट दीं। वे जेल की कोठरी से उसे फांसी घर की ओर ले जाने लगे। रास्ते में भी उसके चेहरे पर किसी तरह की चिन्ता दिखाई नहीं दे रही थी। वह एक वीर की भांति चल रहा था। यह सब देखकर जेल के कठोर अफसर भी दंग रह गए। जब उसे काल कोठरी की तरफ से ले जाया जाने लगा तो उसने खुशी से ‘वन्देमातरम्’ तथा ‘भारत माता की जय’ का ऊंचे स्वर में उद्घोष किया। ऊंची आवाज में ‘ब्रिटिश सरकार मुर्दाबाद’ का नारा लगाया। बाद में राम प्रसाद ने धीमे स्वर में ‘विश्वानि देव सवितु: दुरितानि परसुव’ और कुछ अन्य प्रार्थनाएं कीं और फिर फांसी के फ़न्दे की ओर बढ़ा।

जब राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) को फांसी दी जा रही थी तब जेल के आस-पास कड़ा पहरा था। उनकी मृत्यु के बाद अधिकारियों ने उनका शव काल-कोठरी से बाहर निकाला। जेल के बाहर उसके माता—पिता ही नहीं अपितु सैकड़ों नर-नारी सजल नेत्रों के साथ खड़े थे। गोरखपुर के नागरिकों ने भारत मां के इस वीर सपूत के शव को फूलों से सजाया। एक बड़े जुलूस की तरह उनकी शवयात्रा निकाली गई। रास्ते में असंख्य नर-नारियों ने शव पर पुष्प बरसाए और इस तरह इस वीर सपूत का अंतिम संस्कार किया गया। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) उन गिने-चुने शहीदों की श्रेणी में जा पहुंचे थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए बलिदान दिया था। उनका परम उद्देश्य था – किसी न किसी तरह यह देश आजाद हो।

फांसी के लिए जाने से कुछ ही समय पूर्व राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) ने एक कविता लिखी-

“हे ईश्वर! जो तुम चाहते हो वही होता है।

आप महान हो। मुझे वर दो,

कि अपनी अंतिम सांस तक और मेरे रक्त की अंतिम बूंद तक,

मैं तुम्हारा ही ध्यान करूं तथा तुम में ही विलीन हो जाऊं।”

ऐसा था बिस्मिल का बचपन

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर नामक स्थान पर 1897 में हुआ था। उनके पूर्वज ग्वालियर राज्य के तोमरगढ़ नामक स्थान के थे। यह इलाका चम्बल नदी के किनारे बसा था और उसकी गणना ब्रिटिश प्रान्तों के साथ होती थी। चम्बल घाटी में रहने वाले लोग वीर और मेहनती हुआ करते थे। अनेक पीढ़ियों से कई राज्यों ने इन लोगों पर नियंत्रण करने की कोशिश की मगर किसी को भी सफलता नहीं मिली।

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) के पिता मुरलीधर ने बहुत कम शिक्षा पाई थी। वे शाहजहाँपुर नगरपालिका में कर्मचारी थे। कुछ समय बाद वे नौकरी से ऊब गये और नौकरी छोड़कर उन्होंने स्वतंत्र जीवन-यापन शुरू कर दिया। वे ब्याज पर ऋण देने लगे और उनकी गाड़ियाँ भी किराये पर चलने लगीं। उनका पहला पुत्र काफी कम समय जीवित रहा। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) उनका दूसरा पुत्र था।

इस बालक में भी पहले बच्चे की तरह रोग के लक्षण दिखाई देने लगे थे। उसकी दादी ने झाड़-फूंक करने वालों से ताबीज लाकर बालक के गले में बाँधी। ममतामयी दादी से बच्चे को स्वस्थ करने के लिए जो कुछ कहा जाता, वह खुशी से करती थी। आखिर वह बच्चा बच गया।

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) को सम्पूर्ण परिवार का असीम प्यार मिला। जब वह सात वर्ष का था तो पिता मुरलीधर ने उसे हिंदी पढ़ाना शुरू किया। साथ ही उर्दू सीखने के लिए उसे मौलवी के पास भेजा गया। अंत में राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) पाठशाला में जाने लगा। 14 वर्ष की आयु में इस बालक ने उर्दू में चौथी कक्षा की पढ़ाई पूरी कर ली। वह उर्दू की कुछ रोचक कथाएँ और उपन्यास भी पढ़ने लगा था। पुस्तकें खरीदने के लिए अब उसे पैसों की जरूरत पड़ी। लेकिन पिताजी उसके लिए पैसे नहीं देते थे। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) ने सरल रास्ता चुना, वह पिता के संदूक से पैसे चुराने लगा। कुसंगति के कारण उसे बीड़ी-सिगरेट पीने की लत भी लग गई। कभी-कभी वह भाँग और चरस भी पी लेता। इसी कारण राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) पाँचवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया। किसी न किसी तरह पिता को लड़के की इन आदतों की जानकारी मिल गई। उन्होंने संदूक का ताला बदल दिया। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) ने अंग्रेजी शाला में जाने की इच्छा प्रकट की। पिताजी इसके लिए राजी नहीं हुए। किन्तु जब राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) की माँ ने बेटे का पक्ष लिया, तब पिता ने उसे अंग्रेजी पाठशाला में भर्ती करा दिया।

काकोरी रेल डकैती

काकोरी लखनऊ के निकट ही बसा एक गाँव है। उस गाँव में रेलगाड़ी पर हमले के कारण ही काकोरी स्टेशन प्रसिद्ध हो गया।

वह 9 अगस्त 1925 की शाम थी। 8 – डाऊन रेलगाड़ी काकोरी के निकट से गुजर रही थी। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) और उनके नौ क्रांतिकारी साथियों ने जंजीर खींचकर गाड़ी रोक दी। उन्होंने सरकारी धन लूट लिया जो कि गार्ड के डिब्बे में रखा था। अचानक एक गोली चली जिससे एक यात्री की मृत्यु हो गई। इसके अलावा कहीं खून-खराबा नहीं हुआ।

इस सुनियोजित डकैती से सरकार भौंचक्की रह गई। एक माह तक प्रारंभिक छानबीन के बाद सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए जाल फैलाने की पूरी तैयारी कर ली। डाका डालने वाले दस क्रांतिकारियों को ही नहीं अपितु हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के अन्य नेताओं के नाम भी वारंट जारी कर दिये गये। चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर शेष सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गये जिन्होंने रेल लूटी थी। डेढ़ वर्ष तक मुकदमा चला। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil), अशफाकउल्ला, रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी चारों क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई गई। देशभर में इन लोगों के प्राण बचाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया। सभी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से अपील की कि इन युवकों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार किया जाये; मगर सरकार अपने फैसले पर अडिग रही।

18 दिसम्बर 1927 को राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दे दी गई। राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) व अशफाक उल्ला 19 दिसम्बर को और रोशन सिंह 20 दिसम्बर को फाँसी पर चढ़ा दिये गये। सभी ने स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में शौर्य और अदम्य साहस का नया अध्याय लिखा।

हीरे की तरह कठोर-फूल की भांति कोमल

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) ने अपने स्वभाव तथा गुणों के कारण सभी का सम्मान प्राप्त किया था। वे सोचते थे कि विदेशियों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हमारा देश आजाद होना ही चाहिये। उसे आजाद कराने का सही तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। उनके रास्ते में कितनी ही बाधायें आई, कितनी समस्याओं ने उन्हें परेशान किया, राह के काँटों को पार करते हुए वे सदैव सिर ऊँचा उठाकर ही चले। उसी रास्ते पर मौत भी उनके इंतजार में खड़ी थी, मगर राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) जरा भी विचलित नहीं हुए।

ईमानदारी की मिसाल थे राम प्रसाद

राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) कभी किसी को धोखा नहीं दिया। बेईमानी व धोखेबाजी से उन्हें बड़ी घृणा थी। जब भी उन्हें दगाबाजी की गन्ध मिलती, जिम्मेदार व्यक्ति की हैसियत की चिन्ता किये बिना ही वे उसकी भर्त्सना करते। यह भी कहा जा सकता है कि वे बेईमान बनने को तैयार नहीं थे, इसलिए उनकी मौत का सामना करना पड़ा।

अपनी जीवनी में राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) ने लिखा है कि कैसे काकोरी केस में उन्हें गिरफ्तार करके थाने ले जाया गया। वे लिखते हैं—“इस मामले से सम्बद्ध गिरफ्तारियों में पुलिस अधिकारी रातभर व्यस्त रहे। वे जरा भी नहीं सो पाये थे। आखिर वे सब चले गये। एक सिपाही जो पहरे पर था। वह भी गहरी नींद में था। एक बाबू थाने में बैठा-बैठा लिख रहा था। वह रोशन सिंह का चचेरा भाई था। यदि मैं चाहता तो मैं बड़े आराम से निकल कर भाग सकता था मगर मेरे ऐसा करने से वह बाबू बड़ी मुसीबत में पड़ जाता। मैंने उसे बुलाया और उससे कहा कि अगर तुम परिणाम भुगतने को तैयार हो तो मैं भाग सकता हूँ। वह मुझे भलीभाँति जानता था। वह मेरे पैरों पर गिर पड़ा तथा मुझसे कहने लगा कि अगर मैं भाग गया तो उसे पकड़ लिया जायेगा। उसके बाल-बच्चे भूखे मर जायेंगे। मैंने पीठ थपथपाकर उसे जाने दिया। मुझे उस पर बड़ी दया आ रही थी।”

कुछ ही दिन बाद राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) को भागने का एक मौका और मिला। उन्हें बाहर ले जाया जा रहा था। एक सिपाही भी साथ में था। दूसरे सिपाही ने कहा- “उसे जंजीर से बाँध दो।” मगर सिपाही ने बड़े विश्वास से उत्तर दिया- “मुझे इन पर पूरा भरोसा है। ये भागेंगे नहीं।” हम एक सुनसान जगह गये। मैंने अपना हाथ दीवार पर रखा और पीछे देखने लगा। सिपाही कुश्ती देखने में व्यस्त था। वह पूरी तरह कुश्ती देखने में खो गया था। मैं थोड़ी-सी कोशिश करके दीवार फाँद सकता था मगर, मैंने ऐसा नहीं किया। मेरी अन्तरात्मा कह रही थी- “क्या ऐसे भागकर, उस गरीब सिपाही ने तुम पर जो भरोसा किया है तथा तुम्हें आजादी दी है, उसको ठेस नहीं लगेगी ? क्या यह सही होगा ? उसकी बीबी-बच्चे तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे ?’ मेरे मन में यह विचार आया और मैंने दीर्घ श्वास छोड़ा। मैंने सिपाही को बुलाया तथा हम वापस थाने लौट आये।

जिस किसी ने भी आप पर भरोसा किया उसे धोखा कदापि न दिया जाये, यही राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) की मान्यता थी। फिर वह बाबू हो या सिपाही। जेल में भी सिपाहियों को उन पर विश्वास था। उनका चरित्र ही ऐसा था। उनकी फाँसी की सजा दिये जाने के बाद भी वे अपने इस सिद्धान्त पर कायम रहे। जिन्होंने भरोसा किया, उनको संकट में डालकर भाग जाना वे पूर्णतया अनुचित व अनैतिक समझते थे।

भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में काकोरी रेल डकैती का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। वीर राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) ने इसकी योजना बनाई तथा बड़ी चतुराई से उस को कार्यान्वित किया। एक क्रांतिकारी लेखक, एक आदर्श मानव व वीर पुरुष के रूप में राम प्रसाद (Ram Prasad Bismil) सदैव हमारे हृदय में बसे रहेंगे।

मातृभूमि के लिए कहे उनके ये शब्द सदा के लिए अमर हो गए।

“यदि मातृभूमि के लिए मुझे हजार बार मौत को गले लगाना पड़ा तो भी मुझे दु:ख नहीं होगा। हे प्रभु! मुझे भारत में सौ बार जन्म दो ! परन्तु मुझे यह वरदान भी दो कि हर बार मेरा जीवन मातृभूमि की सेवा में ही लगे।” यह प्रार्थना स्वतंत्र भारत के हर नागरिक के हृदय में बसी रहे और उसकी ध्वनि हमारे कानों में गुंजित होती रहे।