नक्सलियों की भाषा बन रही सुरक्षाबलों के लिए मुसीबत, जांच में भी आती हैं मुश्किलें

नक्सलवाद (Naxalism) के खिलाफ सरकार, प्रशासन और सुरक्षाबल लगातार कार्रवाई कर रहे हैं। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़े खतरों में एक लाल आतंक का सफाया करना सरकार का मकसद है।

Naxalites

नक्सलवाद (Naxalism) के खिलाफ सरकार, प्रशासन और सुरक्षाबल लगातार कार्रवाई कर रहे हैं। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़े खतरों में एक लाल आतंक का सफाया करना सरकार का मकसद है। इसके लिए हर स्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं। नक्सलियों (Naxalites) के खिलाफ इन अभियानों में सुरक्षाबलों के सामने एक मुश्किल कई बार आती है। वो है, भाषा की मुश्किल।

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फाइल फोटो।

दरअसल, कई बार ऐसे नक्सली पकड़े जाते हैं, जिनकी भाषा समझना थोड़ा मुश्किल होता है। जैसे, नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान छत्तीसगढ़ सीमा के आस-पास के इलाकों से दक्षिण भारत की भाषा बोलने वाले कई नक्सली (Naxalites) पकड़े जा चुके हैं। नक्सल अभियान के दौरान छत्तीसगढ़ बॉर्डर के आसपास कई बार वायरलेस पर साउथ की भाषा में बातचीत करने की आवाज आती हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, अब नक्सली मैसेंजर के रूप में साउथ इंडियंस को रख रहे हैं। क्योंकि उनकी भाषा हर किसी को आसानी से समझ नहीं आती।

छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड में नक्सलियों के कॉरिडोर खूंटी, सरायकेला और लातेहार सीमा के इलाकों में सक्रिय नक्सलियों (Naxalites) के साथ दक्षिण के भी कुछ नक्सली सक्रिय हैं। पुलिस को जांच के दौरान दक्षिण भारत की भाषा बोलने वाले नक्सलियों से पूछताछ में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसका फायदा भी नक्सली उठाते हैं। हालांकि, सीआरपीएफ (CRPF) में दक्षिण भारत की भाषा बोलने और समझने वाले जवान हैं। पुलिस को कई बार जांच में इनका सहारा भी लेना पड़ता है।

इस मामले में झारखंड पुलिस (Jharkhand Police) के अफसरों का कहना है कि पुलिस सक्षम है। किसी भी जांच में भाषा की वजह से परेशानी नहीं होती है। लेकिन यह भी सच है कि दक्षिण भारत के कई ऐसे क्षेत्र है, जहां बोली जाने वाली भाषा कठिन है। मलयाली एसोसिएशन के एक पदाधिकारियों का कहना है कि दक्षिण भारत में बोली जाने वाली भाषाएं काफी समृद्ध हैं। कई बार गोपनीयता के मद्देनजर पीए या मैसेंजर आदि के पद पर दक्षिण भारतीयों को विशेष तौर पर बहाल किया जाता है।

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