गांधी जयंती 2020: बंगाल में पूजनीय हैं सुभाष चंद्र बोस, नेताजी के साथ अन्यायपूर्ण बर्ताव के कारण गांधी जी को नापसंद करते हैं बंगालवासी

बोस को लेकर जो प्रश्न उठाया जाता है, वह ज्यादा अहम है। गांधी (Mahatma Gandhi) नहीं चाहते थे कि बोस दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनें। जब बोस जीत गए तो गांधी ने कार्यकारी समिति बनाने में बोस से सहयोग करने से मना कर दिया।

Mahatma Gandhi

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Mahatma Gandhi 151th Birth Anniversary: गांधी जी (Mahatma Gandhi) को लेकर बंगाल के लोगों की प्रतिक्रिया सहज नहीं मानी जाती है। कुछ लोग उन्हें बंटवारे का जिम्मेदार मानते हैं तो कुछ लोग सुभाष चंद्र बोस को लेकर उनके सख्त रवैये पर सवाल उठाते हैं।

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इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गांधी (Mahatma Gandhi) को बंगाल के अधिकतर लोग नापसंद करते हैं। कुछ गांधी को विभाजन के लिए जिम्मेदार मानते हैं और कुछ 1938-39 में सुभाष चंद्र बोस के प्रति गांधी के व्यवहार पर प्रश्न करते हैं। बंगाल में बोस पूजनीय आदर्श हैं और माना जाता है कि गांधी ने उनसे अन्यायपूर्ण व्यवहार किया था। इन दोनों ही नजरियों का विश्लेषण किए जाने की आवश्यकता है।

गांधी (Mahatma Gandhi) जिस तरह अहिंसा के सिद्धांत से समझौता नहीं करते थे, उसी तरह उन्हें आजादी के साथ देश का बंटवारा गवारा नहीं था। 1946-47 में जब उन्हें पता चला कि उनके चुने प्रतिनिधि और अनुगामी विभाजन की शर्त पर भी बदलाव के लिए तैयार हैं तो उन्होंने खुद को इससे अलग करके अपना समय जातीय हिंसा में उजड़ चुके पूर्वी भारत के आम लोगों के बीच बिताने का निर्णय लिया। कुछ लोग मानते हैं कि गांधी उस समय आंदोलन कर सकते थे। पर तथ्य यह है कि खान अब्दुल गफ्फार खान को छोड़कर, उस समय कांग्रेस के हर एक महत्वपूर्ण नेता ने विभाजन को भाग्य मानकर स्वीकार कर लिया था। गांधी जानते थे कि आंदोलन के लिए उन्हें एक संगठन चाहिए और सहायता करने के लिए सक्षम नेता भी चाहिए।

बोस को लेकर जो प्रश्न उठाया जाता है, वह ज्यादा अहम है। गांधी (Mahatma Gandhi) नहीं चाहते थे कि बोस दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनें। जब बोस जीत गए तो गांधी ने कार्यकारी समिति बनाने में बोस से सहयोग करने से मना कर दिया। विवश होकर बोस ने पहले अध्यक्ष पद छोड़ा और अंतत: अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए कांग्रेस को भी छोड़ दिया। प्रशंसक भी मानेंगे कि यह घटना गांधी के सकारात्मक पहलू को नहीं दर्शाती। हालांकि, गांधी और बोस के रिश्ते के संदर्भ में बाद के घटनाक्रमों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। आजाद हिंद फौज का गठन करते वक्त बोस ने स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के योगदान को याद करते हुए उन्हें राष्ट्रपिता कहा था और अपनी आजाद हिंद फौज की एक रेजिमेंट का नाम गांधी ब्रिगेड रखा था। गांधी ने भी बोस को महान देशभक्त माना था और उन्हें अपना खोया हुआ बेटा बताया था।

बंगाली लोगों की विरोधाभासी भावना के बीच एक तथ्य यह भी है कि गांधीजी (Mahatma Gandhi) के जीवन में सुनहरे वक्त का अधिकांश हिस्सा बंगाल में ही बीता था। 1947 में गांधी (Mahatma Gandhi) के प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार से आजादी के मुद्दे पर वार्ता में व्यस्त थे। उस समय गांधी पूर्वी बंगाल के हिंसा प्रभावित नोआखली और सांप्रदायिक हिंसा में जल रहे कलकत्ता में आम लोगों के बीच थे। वह उनके जख्मों पर मरहम लगा सामुदायिक सद्भावना कायम करने में जुटे थे।

अपने जीवनकाल के अंतिम दिनों में गांधी (Mahatma Gandhi) ने बांग्ला का अभ्यास किया था। उनके लिए बांग्ला बस एक और लिपि मात्र नहीं थी। बल्कि वो भाषा थी जिसमें ‘एकला चलो रे’ (रवींद्रनाथ टैगोर का गीत) लिखा गया था। गीत के बोलों ने गांधी को उनके जीवन के अंतिम महीने में बहुत सहारा दिया। इस दौरान उन्होंने कलकत्ता, नोआखली और अन्य जगहों पर विभाजन की भेंट चढ़े अभागों को याद किया और फिर मृत्यु की ओर तेजी से बढ़ चले, अकेले और एकाकी।

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