राजमाता जीजाबाई जयंती: केसरिया क्रांति की जननी, अपने लाल शिवाजी को बनाया बनाया फौलाद

जीजाबाई एक महान देशभक्त थी, जिनके रोम-रोम में देश प्रेम की भावना प्रज्जवलित थी। इसके अलावा वे भारत की वीर छत्रपति शिवाजी महाराज राष्ट्रमाता के रुप में भी मशहूर थी।

Jijabai जीजाबाई Rajmata Jijabai

Raj Mata Jijabai Death Anniversar ।। छत्रपति शिवाजी महाराज की माता

Jijabai Death Anniversary: जीजाबाई (Jijabai) (1594-1674) मराठा सरदार छत्रपति शिवाजी की माँ थीं। शिवाजी को संभवतया मध्ययुगीन काल के अत्यंत ख्यातिप्राप्त एवं सफल हिंदू योद्धाओं में से एक माना जाता है। शिवाजी की मां जीजाबाई (Jijabai) का जीवन किसी भी दृष्टि से कम प्रेरणादायक नहीं है। हमारे इतिहास में उन्हें गौरवशाली स्थान प्राप्त है।

उनके पिता लखुजी जाधव राव एक महत्त्वपूर्ण नेता थे और दक्षिण के राज्य निजामशाही के अधीन कार्यरत् थे। उन दिनों उस क्षेत्र के अनेक हिंदू नेता निजाम के अंतर्गत सेवारत थे। उनके पास अपनी-अपनी छोटी सेनाएँ थीं और उन्होंने निजाम के अधीन जमीनें, ऊँचे ओहदे और पदवियाँ हासिल कर ली थीं, लेकिन वे एक-दूसरे से नफरत करते थे और एक-दूसरे की जान की कीमत पर अपनी ताकत और प्रतिष्ठा बढ़ाने की कोशिश करते रहते थे।

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होली का अवसर था और जीजाबाई (Jijabai) के पिता अपने दरबार में एक समारोह का आयोजन कर रहे थे, जहाँ बहुत लोग जमा थे। वहाँ जीजाबाई (Jijabai) का भावी पति शाहजी, पुत्र मालोजी (जो जाधव राव के अधीन सेवारत थे) भी मौजूद था। शाहजी और जीजाबाई (Jijabai) छोटे बच्चे थे। जीजाबाई (Jijabai) ने शाहजी पर रंगीन पानी डाल दिया, प्रत्युत्तर में शाहजी ने भी वैसा ही किया। जाधव राव को लड़का अच्छा लगा और उन्होंने शाहजी तथा अपनी बेटी को अपने पास खींच लिया और मजाक में कहा, “क्या आपको नहीं लगता कि इन दोनों की जोड़ी बढ़िया दिखती है ?” सब लोगों ने इसे मजाक माना। मालोजी, जो यह देख रहे थे, खड़े हो गए और बोले, “सज्जनो, आपने सुना, जाधव राव ने अभी-अभी क्या कहा है? अत: वर-वधू के जनक होने के नाते अभी से हम एक-दूसरे के संबंधी बन गए हैं।” लेकिन जाधव राव के मन में ऐसा कुछ नहीं था। मालोजी की तुलना में उनका ओहदा और रुतबा बहुत ऊँचा था। उन्होंने मालोजी को रुखाई से झिड़क दिया। मालोजी ने बहुत अपमानित महसूस किया। वे भरी सभा में शर्मिंदा होने के कारण वहाँ से बाहर चले गए।

बाद के कुछ महीनों में मालोजी बहुत परेशान रहे। जीवन में अगला कदम क्या उठाना है, इस बारे में वे कुछ भी निश्चित नहीं कर सके। कुछ समय के लिए वे वापस खेत जोतने लगे, लेकिन वे दुःखी थे कहा जाता है, एक रात मालोजी को एक अजीब सपना आया। देवी भवानी ने दमकती भव्यता में उन्हें दर्शन दिए और उन्हें रुष्ट न होने बल्कि जीवन में साहस के साथ संघर्ष करने को सलाह दी, क्योंकि उनके परिवार में जल्दी ही एक शूरवीर एवं नूतन युग-प्रवर्तक जन्म लेने वाला है। अगले दिन खेत में देर रात उन्हें एक बार फिर ऐसा लगा कि भवानी सामने खड़ी हैं और उन्हें किसी एक खास जगह जमीन खोदने के लिए कह रही हैं। उन्होंने ऐसा ही किया। उस जगह खुदाई में उन्हें 1. खजानों से भरे 7 पुत्र मिले। उस खजाने तक उन्हें चाहे किसी भी तरह पहुँचाया गया हो, परंतु उस खजाने की वजह से भारत के भविष्य पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ना निश्चित हो गया था। मालोजी ने 1000 घुड़सवारों और पैदल सैनिकों को खरीद लिया। उन्होंने लोगों को, व्यापारियों को सुरक्षा मुहैया कराई और ऐसा करने में उनकी धन-दौलत भी बढ़ने लगी। अपने धन से उन्होंने कुएँ और कुंड खुदवाए, यात्रियों के लिए सराय बनवाई, जरूरतमंद लोगों को खाना दिया और मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ गई तथा अधिक से अधिक लोग उनके अधीन काम करने चले आए। मालोजी जाधव राव के शब्दों को भूले नहीं थे वे अभी भी अपमानित महसूस करते थे, अत: उन्होंने जीजाबाई (Jijabai) और शाहजी का विवाह करने के लिए जाधव राव पर जोर डालना शुरू कर दिया। जाधव राव ने इनकार कर दिया, लेकिन मालोजी ने भारी दबाव डाला और निजाम की मध्यस्थता का सहारा लिया, जिसके कारण जाधव राव को राजी होना पड़ा।

जीजाबाई (Jijabai) और शाहजी का विवाह संपन्न हो गया, लेकिन जाधव राव मालोजी के परिवार ‘भोंसले कुटुंब’ से घृणा करने लगे। शाहजी बड़े होकर एक विख्यात सेनानायक बने और निजाम की सेवा में लग गए। शाहजी को परेशान करने के उद्देश्य से जाधव राव मुगलों के साथ हो लिये (जो निजाम के खिलाफ थे)। जाधव राव जीवन भर शाहजी के लिए मुश्किलें खड़ी करने में लगे रहे । जीजाबाई (Jijabai) इस बात से बहुत दुःखी थीं। वे इस बात से भी नाखुश थीं कि उनके अपने पिता और पति दोनों उन सुलतानों के अधीन काम कर रहे थे, जो उनकी नजर में लुटेरों से ज्यादा कुछ नहीं थे। इस सेवा से आनेवाली धन-संपत्ति की उन्हें कोई चाह नहीं थी। उनके लिए स्वाधीनता ही सबकुछ थी। इस बीच मुगलों ने निजाम के अधिकार क्षेत्रों पर हमला कर दिया। शाहजी को माहुली किले की रखवाली करने की जिम्मेदारी दी गई। इस हमले में जाधव राव शामिल थे। 6 महीनों के प्रतिरोध के बाद शाह जी को जीजाबाई (Jijabai) के साथ किला खाली करना पड़ा, जो उस समय 4 माह के गर्भ से थीं। वो शिवनेरी पहुँच गईं, जहाँ उन्होंने शिवाजी को जन्म दिया।

जब वे गर्भ से थीं, उस दौरान जगदंबा के मंदिर में यह प्रार्थना किया करती थीं, “ओ माँ, सृष्टि की जननी, अपनी कुछ शक्ति मुझे दो! मुसलमानों को शर्मनाक खिदमत में मराठों के आत्माभिमान को समाप्त करो। हमारी भूमि को स्वाधीनता प्रदान करो। ओ माँ, मेरी यह विनती स्वीकार करो कि मेरी इच्छा पूरी हो।”

उन लोगों के आस-पास रहना उन्हें क्रोधित करता था, जो अपनी औरतों, अपने बच्चों, अपने देश और धर्म की रक्षा नहीं कर सकते थे। उनकी अंदरूनी इच्छा थी कि उनका पुत्र उस पीढ़ी का हिस्सा बने, जो यह काम कर सके। उन्होंने अनुभवी राजनीतिज्ञों एवं कूटनीतिज्ञों की संगति में देश की जटिल समस्याओं का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि कभी सोने की खान कहलाने वाली धरती के बाशिंदे घोर गरीबी में जी रहे हैं और वह संस्कृति खंडित हो रही है जिससे वे बहुत प्यार करती हैं। कोई ऐसा नेता पैदा होना चाहिए जो बिखरे हिंदुओं को एक कर सके। उन्हें सुख सुविधाओं की इच्छा नहीं थी। वे तो पहाड़ियों पर बने किलों की छत पर चढ़ना, हाथों में तेग-तलवार पकड़ना, राजनीतिक समस्याओं पर चर्चा करना, कवच पहनना और अश्वारोही सैनिक बनना चाहती थीं।

प्राचीन हिंदू संस्कृति में यह कहा गया है और जिसकी सच्चाई आज प्रमाणित हो चुकी है कि जो स्त्री माँ बनने वाली होती है, उसे जिस प्रकार का वातावरण मिलता है, जो विचार उसके मन में आते हैं और अपने अजन्मे बच्चे के लिए वह जो इच्छाएँ रखती है, उन सब बातों का बच्चे के जीवन पर वैसा ही अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। वैदिक परंपराओं में ऐसे अनेक संस्कार एवं स्तुतियाँ हैं, जिनको अनुष्ठान पूर्वक पूरा करने से बच्चे के होनहार होने की आशाएँ पुष्ट होती हैं। जीजाबाई (Jijabai) ने शिवाजी में ऐसे संस्कार डाले, जो जीवन भर उनके लिए प्रेरणास्रोत बने रहे।

अकस्मात् एक अत्यंत बुरी खबर ने जीजाबाई (Jijabai) का दिल दहलाकर रख दिया। उनके पिता जाधव राव का, जिन्हें हाल ही में निजाम की सेवा में पुनः नियुक्त किया गया था, उनके पूरे परिवार के साथ कत्ल कर दिया गया था। हो सकता है निजाम ने सोचा हो कि मराठा लोग प्रभावशाली होते जा रहे हैं। उनके पति के साथ भी कुछ ऐसा ही होने का खतरा था, लेकिन वे इस मामले में काफी होशियार थे और मुगलों के साथ हो गए थे। उनके समस्त परिवार का खात्मा किए जाने की खबर ने उनकी क्रोधाग्नि को बहुत भड़का दिया। मराठों के गाँव-के-गाँव उजाड़ दिए गए। एक मराठा राजकुमारी को तो स्नान करते हुए उठाकर ले जाया गया। एक बार जीजाबाई (Jijabai) को भी अपहत कर लिया गया था, सौदेबाजी के लिए मोहरा बनाकर। ऐसे उथल-पुथल भरे समय में उनका जीवन बीता, लेकिन इन भीषण घटनाओं से वे भयभीत नहीं हुईं, बल्कि उनकी दृढ़ता और मजबूत हो गई। उनका यह विश्वास और पक्का हो गया कि हिंदुओं का एक स्वतंत्र संरक्षक होना ही चाहिए।

जीजाबाई (Jijabai) ने अपने पुत्र को स्वतंत्रता से प्यार करने की शिक्षा दी। वे उस समय दादाजी कोंडदेव के संरक्षण में पुणे में रहते थे। जीजाबाई (Jijabai) पुणे के मुख्य प्रशासकों में से एक थीं। वे शिक्षित और योग्य थीं तथा वे पूरे अधिकार के साथ शासन सँभालती थीं (वे मध्ययुगीन भारत की उत्पीड़न साहनेवाल हिंदू महिलाओं की तरह नहीं था)। वे जब वहाँ आए, पुणे एक छोटा सा गाँव था, जिसे निजाम, आदिलशाह और मुगलों ने बारी-बारी से उजाड़ा था। हिंदुओं के मंदिरों को चुन-चुनकर ध्वस्त कर दिया गया था। जीजाबाई (Jijabai) को मदद से पुणे पुनः जी उठा। जीजाबाई (Jijabai) ने टूटे मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और अनेक अवसरों पर विवादों का निपटारा किया तथा न्याय किया। शिवाजी की अधिकतर शिक्षा उन्हों को देखभाल में हुई। उन्होंने शिवाजी को महाभारत और रामायण के पाठ विस्तार से पढ़ाए। शिवाजी ने पवित्र धर्म ग्रंथों और प्रशासन कला एवं अस्त्र शस्त्रों के बारे में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया और राजनीतिक परिस्थितियों को देखा-समझा।

शाहजी ने दूसरी स्त्री, तुकाबाई के साथ विवाह कर लिया और वे अधिकतर समय दूसरी पत्नी एवं उसके पुत्र के साथ बिताने लगे। जीजाबाई (Jijabai) ने हिम्मत नहीं हारी और वे पहले की तरह शासन के कामकाज को सँभालती रहीं तथा शिवाजी के पालन-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा तथा देर रात तक प्रार्थना एवं साधना करने में लगी रहीं। उनकी धर्मपरायणता का एक उदाहरण यह दिया जाता है कि उनकी सलाह पर ब्राह्मणों ने बालाजी निंबलकर नामक एक सिपाही को इस्लाम धर्म कबूलने के बाद पुनः हिंदू धर्म अंगीकार करने की आज्ञा दे दी। उन दिनों बहुत लोग ऐसा करने के विरुद्धथे। वही मानसिकता आज भी कुछ हद तक मौजूद है, लेकिन जीजाबाई (Jijabai) की मान्यता थी कि जो व्यवस्था लोगों को हिंदू समुदाय छोड़कर जाने तो देती है, लेकिन दुबारा उसमें आने नहीं देती (जिसका धर्मग्रंथों में कोई आधार नहीं मिलता है)। उस व्यवस्था के कारण हिंदू समाज कमजोर हो रहा था। जीजाबाई (Jijabai) ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस तर्क को समझने की कोशिश करें।

शिवाजी ने जब 16 वर्ष की आयु में एक बड़े किले पर कब्जा कर लिया तो शाहजी और दादाजी का चिंतित होना स्वाभाविक था, लेकिन जीजाबाई (Jijabai) को बहुत अधिक खुशी हुई। जिस समय बीजापुर का विख्यात सेनापति अफजल खान एक बड़ी फौज के साथ शिवाजी को ललकारने के लिए आया तो शिवाजी ने अपनी माँ से सलाह मांगी, जिन्होंने दूसरों की मंत्रणा के विपरीत शिवाजी को दृढ़ता के साथ संकट का सामना करने की सलाह दो। शिवाजी की फौज अपेक्षाकृत बहुत छोटी थी, लेकिन किसी-न-किसी बहाने समय गुजरने देने और गुरिल्ला युक्तियों का प्रयोग करके शिवाजी ने अफजल खान की फौज को पछाड़ दिया। जब एक व्यक्तिगत मुलाकात में अफजल खान ने शिवाजी को जान से मारने की कोशिश की तो अफजल खान खुद ही मारा गया। इस प्रकरण के कारण शिवाजी की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

जीजाबाई (Jijabai) शिवाजी के साथियों को अपने पुत्र जैसा मानती थीं और उनके लिए साहस एवं प्रेरणा का स्रोत बन गई थीं। तानाजी मालुसरे इसका एक विशिष्ट उदाहरण है। मुगलों द्वारा किए गए एक भीषण आक्रमण में वह सिंहगढ़ का किला हार गया। जीजाबाई (Jijabai) ने उससे यह कहा बताया जाता है कि अगर तुम सिंहगढ़ को दुश्मनों से छुड़ा लो तो तुम मेरे लिए शिवाजी के छोटे भाई समान होगे तानाजी उनका कहा मानकर जोश के साथ अपने मिशन पर चला गया और जिस काम को दूसरे लोग असंभव मान रहे थे, उसमें वह कामयाब हुआ, लेकिन इस प्रक्रिया में वह शहीद हो गया।

जीजाबाई (Jijabai) सारी रात अपने किले से उधर नजर गड़ाए बैठी थीं। उन्होंने जब मराठों का केसरिया ध्वज किले पर फहराते देखा तो वे खुशी से चिल्ला उठीं, लेकिन उसके कुछ ही समय बाद उन्हें तानाजी के मारे जाने की खबर मिली तो वे बिलख-बिलखकर रोने लगीं। उन्हें चुप कराना मुश्किल हो गया। एक और शूरवीर बाजी प्रभु, जो शिवाजी का बचपन का दोस्त था, शिवाजी के जीवन की रक्षा करने के लिए बड़ी बहादुरी से लड़ा और ऐसा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। यह खबर सुनने पर जीजाबाई (Jijabai) इस तरह रोईं, जैसे उनका अपना पुत्र मारा गया हो!

जीजाबाई (Jijabai) को अपने जीवन में एक के बाद एक दुख सहने पड़े और अपने देश एवं धर्म की खातिर वे सारे दुःखों को बहादुरी से पी गईं। उन्होंने माँ दुर्गा के प्रताप और उनकी शक्ति का परिचय दिया। हम आशा करते हैं कि उनकी जीवनगाथा को सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा। सन् 1674 में शिवाजी ने एक बड़े समारोह का आयोजन किया, जिसमें शिवाजी ने स्वयं को एक स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। जीजाबाई (Jijabai) उस समारोह में मौजूद थीं। उन्हें यह देखकर कितनी खुशी हुई होगी कि अपने जीवन में उन्होंने जो कामना की थी, वह अंततः फलदायक सिद्ध हुई। इसके 12 दिनों के बाद 17 जून 1967 को जीजाबाई (Jijabai) स्वर्ग सिधार गईं।