कोरोना से भी खतरनाक थी ये बीमारी, एडवर्ड जेनर के टीके ने हर साल करोड़ों लोगों को मरने से बचाया

अब कभी बांह पर लगे टीके का निशान जब आपके सामने आए, कुछ उन अज्ञात व्यक्तियों का भी ख्याल कर लिया करें जिन्होंने कभी इन्हीं परीक्षणों के लिए खुद को पेश किया था और एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) का भी ख्याल कर लिया करें जिसने टीके का आविष्कार करके हम सबको चेचक से हमेशा के लिए हिफाजत दिला दी।

Edward Jenner

Edward Jenner

6 करोड़ आदमी, अर्थात- लन्दन, न्यूयॉर्क, टोकियो, शंघाई और मास्को की कुल आबादी का दुगुना। अनुमान किया जाता है कि 1700 और 1800 के बीच यूरोप में 6 करोड़ लोग चेचक से मारे गए थे। 1721 की महामारी में बोस्टन की आधी आबादी चेचक-ग्रसित थी, और इनमें हर 10 रोगियों में एक की मृत्यु भी हुई। किन्तु आज यह विभीषिका दुनिया से ही प्रायः उठ चुकी है। विभीषिका का उन्मूलन टीके की नई ईजाद द्वारा ही सम्भव हो सका था, और इसका प्रवर्तक था- डॉक्टर एडवर्ड जेनर (Edward Jenner)।

एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) का जन्म इंग्लैंड के ग्लोस्टरशायर कस्बे में 17 मई, 1749 को हुआ था। पादरी पिता ने प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए बालक को स्थानीय पाठशालाओं में भेजा। बचपन से हो जेनर की प्रवृत्ति प्राणिशास्त्र में कुछ थी और उसने चिकित्सा शास्त्र का विधिवत् अध्ययन भी शुरू कर दिया था। डॉक्टर बनने का एक तरीका उन दिनों यह था कि किसी और डॉक्टर की शागिर्दी कर लो और जेन्नर भी शल्यविद् डेनिएल लुडलो के यहां एप्रेण्टिस लग गया। 21 साल की उम्र में जेनर (Edward Jenner) लन्दन के सेण्ट जॉर्ज हास्पिटल में पहुंचा कि युग के महान सर्जन जान हण्टर की छत्रछाया में आकर वह भी कुछ बन सके।

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डॉक्टर हण्टर में असीम कुतूहल भरा था, असीम उत्साह भरा था। वह ऐसा चिकित्सक था जिसकी आस्था चीजों को खुद करके देखने में अधिक थी। दुर्भाग्य से उसने खुद को ही कितने परीक्षणों की आधारभूमि बनाया, जिसका नतीजा यह हुआ कि एक लाइलाज बीमारी उसे आ लगी और उसकी ज़िन्दगी छोटी कर गई। खैर, अपने में यदि उसने यह बीमारी भर ली, तो विद्यार्थियों में अपना यह जीवन-दर्शन ही अधिक भरा कि ‘हैरान क्यों होते हो, परीक्षण करके खुद देख क्यों नहीं लेते?’

जान हण्टर का जेनर (Edward Jenner) के साथ पत्र-व्यवहार चलता रहता था, और वह जीवन भर उसका मित्र एवं परामर्शदाता रहा। सेण्ट जॉर्ज के हास्पिटल से स्नातक हो चुकने पर हण्टर ने उसे ग्लोस्टरशायर वापस भेज दिया कि वहां जाकर प्रेक्टिस शुरू कर दे। उसका शायद ख्याल था कि गांव में पैदा हुआ जेनर शहर के तंग वातावरण में प्रसन्न नहीं रह सकेगा । किन्तु गांव में जाकर डाक्टरी करने के इस परामर्श के लिए दुनिया आज हण्टर की बहुत ऋणी है।

वैज्ञानिक चिकित्सा तथा आधुनिक चमत्कारी दवाओं के प्रयोग में आने से पूर्व आम विश्वास देसी ‘टोटको’ में हुआ करता था। समझा जाता था कि कुछ पौधों में रोग को दूर करने की कुछ खास ताकत होती है। डिजिटेलिस का प्रयोग हृदयरोग में बहुत पुराने समय से चला आता था यद्यपि खुद डाक्टरों को भी तब यह मालूम न था कि उसके इस प्रभाव का कारण क्या है। काई अथवा फफूदी का प्रयोग लोग पहले भी करते आए थे कि बीमारी और न फैलने पाए, यद्यपि फ्लेमिंग ने पेनिसिलीन का आविष्कार बहुत बाद में आकर ही किया। आज भी कितनों ही का विश्वास है कि आवाज़ बैठ जाए तो कच्चा प्याज गले के दर्द को ठीक कर सकता है। कुछ हो, कच्चे प्याज में कीटाणुओं को नष्ट करने की ताकत सचमुच है।

वैज्ञानिक विश्लेषण के चिकित्सा-क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ऐसे ही कुछ और अन्ध-विश्वास लोक-प्रसिद्ध थे जिनमें एक यह भी था कि कुछ बीमारियां इन्सान को जिन्दगी में एक ही बार लगा करती हैं। आज के माता-पिता सन्तुष्ट हो जाते हैं कि उनकी लड़कियों को जमीन मीजल्स (खसरा) हो गया है, क्योंकि अधेड़ उम्र की किसी औरत को अगर यह बीमारी पकड़ बैठे तो उसके लिए यह एक मुसीबत ही बन जाए, किन्तु बच्चों पर इसका कोई खास असर नहीं होता। जिस लड़की को जर्मन खसरा एक बार हो गया सारी उम्र अब वह इसकी जिल्लत से मुक्त रहेगी।

यही चीज़ चेचक के बारे में भी लोक-विश्रुत थी कि एक बार चेचक से बच निकलने पर मरीज़ को फिर दोबारा चेचक नहीं लग सकती। पूर्व के लोग इस विचार से फायदा उठाने लगे- अपने जिस्म में जानबूझकर चेचक के कीड़ों को प्रवेश दे-देकर। उन्होंने तो एक ढंग भी निकाल लिया जिससे इन कीड़ों की ताकत कुछ कम हो जाए और अन्दर पहुंचकर ये कुछ ज्यादा नुकसान न पहुंचा सकें। चेचक का मामूली-सा एक आक्रमण, कुछ दिन बाद फिर स्वस्थ और फिर बीमारी का उम्र-भर नाम नहीं। बदकिस्मती से यह उपाय कुछ ज्यादा ही काम कर जाता, कितने ही शख्स इंजेक्शन के बाद फिर भले-चंगे कभी न होते।

ग्लोस्टरशायर की भोली जनता जानती थी कि ‘काऊ पॉक्स’ या बड़ी माता के बीमार को चेचक नहीं लगती। ‘माता’ के नाम से ही स्पष्ट है कि यह बीमारी आम तौर पर गौओं को लगा करती है, और गौओं से विश्रान्त होकर ही मनुष्यों में आती है। लेकिन हैरानी तो यह थी कि एक ऐसी बीमारी, गौओं को जाकर क्यों चिपट जाती है। जिसकी पैदाइश ही घोड़ों के सुमों में होती है।

बड़ी माता या शीतला और चेचक की इस अद्भुत स्थिति का अध्ययन डॉक्टर जेनर (Edward Jenner) ने शुरू किया। वृद्ध आचार्य हण्टर ने उसे प्रोत्साहित किया, “अनुसन्धान करो, किन्तु धैर्य के साथ, और किसी भी पार्श्व की उपेक्षा कभी न करते हुए।”-और, किसी भी वैज्ञानिक अनुसन्धान में, एक निर्देश-सूत्र और क्या हो सकता है ? कुल मिलाकर जेनर ने 27 मरीजों की परीक्षा की। 1796 में उसने अपने निष्कर्षों को प्रकाशित कर दिया। जेनर ने हर बीमार का क्रमिक ‘इतिहास’ तैयार किया और पाया कि, शुरू-शुरू की परीक्षाओं में, शीतला के रोगियों को चेचक नहीं लगती, हालांकि चेचक के मरीज उनके सम्पर्क में नित्य प्रति आते हैं। यही नहीं, चेचक के कुछ कीटाक्त द्रवों को उसने इन लोगों की बांहों में इंजेक्ट करके भी देखा कि इन्हें चेचक छता तक नहीं।

और अन्त में हमें बच्चे के मां-बाप की हिम्मत की दाद देनी चाहिए-डॉक्टर जेनर (Edward Jenner) ने एक आठ साल के तन्दुरुस्त बच्चे जिम्मी फिप्स को माता का टीका लगाया और उसे तन्दुरुस्त से बीमार कर दिया। इसके बाद उसने चेचक का टीका उसे, और एक ऐसे शख्स को भी लगाया जिसे माता नहीं थी। चेचक निकली-माता की लानत से मुक्त तन्दुरुस्त आदमी में, माता के कीटाणुओं से ‘सुभग’ फिप्स में नहीं। जेनर (Edward Jenner) ने जब अपने इन निष्कर्षों को प्रकाशित किया, स्वभावतः एक तूफान ही उठ खड़ा होना था। कुछ ने तो यह कहा कि यह प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है, जबकि कुछ और ने दावे पेश किए कि यह खोज उनकी थी, और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने चेचक की इस कहानी को ठीक तरह से समझे बगैर परीक्षण भी शुरू कर दिए और इसी घपले में, बीमारों को तन्दुरुस्ती तो क्या देनी थी-मौत बख्श दी!

उत्तेजना का यह दौर आया और चला भी गया, और तब जेन्नर ने अपने तरीकों को चिकित्सा-जगत् के सम्मुख सिद्ध कर दिखाया, जिसके श्रेयस्वरूप अब सम्पूर्ण सभ्य विश्व से उसे सम्मान और आदर मिलने लगा पालियामेंट ने उसके लिए नाइटहुड की सिफारिश की और 20,000 पौंड इनाम दिलवाया। ऑक्सफोर्ड ने उसे एक ऑनरेरी डिग्री दी। रूस के जार ने उसे एक सोने की अंगूठी भेजी। फ्रांस के नेपोलियन ने खुले दिल से उसकी प्रशंसा की। और अमेरिका से इंडियन का एक प्रतिनिधिमण्डल उसके लिए उपहार और धन्यवाद के संदेशों को लेकर इंग्लैंड पहुंचा।

इस व्यक्ति ने गंवारों के एक पुराने अन्धविश्वास का अध्ययन किया और सिद्ध कर दिखाया कि उसमें वैज्ञानिक तथ्य था। साथ ही उसमें यह साहस भी था कि एक मामूली बीमारी को, इंजेक्शन के जरिये, अन्दर पहुंचाकर इन्सान को एक भारी जिल्लत से बचाया जा सकता है। दिल से वह एक देसी हकीम ही था और, यह महान् आदर सम्मान प्राप्त करके, वह दोबारा अपने ही गांव में लौट आया और अपनी जिन्दगी के आखिरी साल उसने अपने खेतों पर ही गुजारे। जनवरी 1823 में उसकी मृत्यु हुई।

अब कभी बांह पर लगे टीके का निशान जब आपके सामने आए, कुछ उन अज्ञात व्यक्तियों का भी ख्याल कर लिया करें जिन्होंने कभी इन्हीं परीक्षणों के लिए खुद को पेश किया था और एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) का भी ख्याल कर लिया करें जिसने टीके का आविष्कार करके हम सबको चेचक से हमेशा के लिए हिफाजत दिला दी।

और उन सभी किस्म के टीकों का ख्याल भी कर लिया करें जो हमारे स्वास्थ्य के अभिरक्षक हैं, प्रहरी हैं जिनमें डॉक्टर जोनास साल्क का निकाला पोलियो से महफूज रखने वाला एक टीका भी है।

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