अनलॉक 1.0: कोरोना को लेकर लोगों की बेफिक्री देश पर पड़ सकती है भारी

25 मार्च से 14 अप्रैल तक पहला लॉकडाउन (Lockdown) लगाया गया। इस दौरान मरीजों की संख्या 10363 थी। 15 अप्रैल से 3 मई के बीच में दूसरा लॉकडाउन लगाया गया। इस समय देश में 39980 मरीज थे। तीसरा 4 मई से 17 मई के बीच लगाया गया। इस समय 90928 मरीज। यही वह चरण था जिसमें लॉकडाउन में ढील देना शुरू की गई।

Lockdown

कोरोना वायरस CoronaVirus COVID-19

लॉकडाउन (Lockdown) खोलने का सबसे बड़ा प्रभाव लोगों की मानसिकता पर पड़ा। लॉकडाउन  के चलते लोग कोरोना को बड़ी महामारी के रूप में देख रहे थे। अब लॉकड़ाउन खुलते ही उनकी सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है। लोगों को लग रहा है कि लॉकडाउन (Lockdown) खोलने का मतलब यह है कि कोरोना का खतरा टल गया है। लोगों की मानिसकता में यह बदलाव आने वाले दिनों में भारी पड़ सकता है। देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

लोगों की बेफिक्री का नतीजा यह है कि एक सप्ताह में ही 50 हजार से अधिक मामले आ गए। 35 मई को भारत जहां दुनिया में दसवें पायदान पर था 31 मई आते-आते वह सातवें स्थान पर पहुंच गया। आलम यह है कि लॉकडाउन (Lockdown) खुलने के साथ ही जो लोग कल तक घरों में दुबके हुए थे और बच्चे घरों में बंद थे‚ वह बिना किसी एहतियात के पार्कों में खेलने लगे। लोग बड़ी बेफिक्री के साथ बाजार जाने लगे। न सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान और न ही मास्क की चिंता। सोसाइटी में जहां बाहरी आदमी का प्रवेश निषेध था‚ वहां धड़ल्ले से लोगों का आना–जाना शुरू हो गया।

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महामारी से बचने के लिए जिन सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन हो रहा था‚ उनमें भी लॉकडाउन (Lockdown) खुलने का असर दिखाई देने लगा और लोग इन उपायों को लेकर लापरवाह नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों की माने तो लोगों की मानसिकता में आया यह बदलाव इस महामारी को काफी गंभीर बना सकता है।

हमारे देश में सबसे बड़ी चिंता का विषय है एसिम्प्टोमेटिक मरीजों का बहुत ज्यादा होना है। आईसीएमआर से लेकर देश का स्वास्थ्य मंत्रालय और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस पर गंभीर चिंता जता चुके हैं। आंकड़ों में देखें तो भारत में एसिम्प्टोमेटिक मरीजों का प्रतिशत 65 फीसद से ऊपर है। पंजाब में इनका प्रतिशत 75‚ कर्नाटक में 50‚ महाराष्ट्र में 70 और उत्तर प्रदेश में 75 है। राजस्थान में भी यह प्रतिशत 60 से ऊपर है। ऐसे में सुरक्षा उपायों की अनदेखी बहुत भारी पड़ सकती है।

एक तरफ लोग इस महामारी को लेकर बेफिक्र नजर आ रहे हैं तो दूसरी तरफ देश के अंदर बड़े पैमाने पर कम्युनिटी संक्रमण शुरू हो चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है देश में लॉकडाउन (Lockdown) हटाने की रणनीति में भारी भूल हुई है। आंकड़े भी कुछ यही गवाही दे रहे हैं। देश में कोरोना का पहला केस 30 जनवरी को आया। 24 मार्च लॉकडाउन  से ठीक 1 दिन पहले देश में मरीजों की संख्या 519 थी।

25 मार्च से 14 अप्रैल तक पहला लॉकडाउन (Lockdown) लगाया गया। इस दौरान मरीजों की संख्या 10363 थी। 15 अप्रैल से 3 मई के बीच में दूसरा लॉकडाउन लगाया गया। इस समय देश में 39980 मरीज थे। तीसरा 4 मई से 17 मई के बीच लगाया गया। इस समय 90928 मरीज। यही वह चरण था जिसमें लॉकडाउन में ढील देना शुरू की गई। 18 मई से 31 मई तक देश में लॉकडाउन का चौथा चरण था और उस समय मरीजों की संख्या 1,82,143 थी। इस लॉकडाउन में और ज्यादा ढील दी गई।

1 जून से अनलॉक–1 शुरू हुआ और यह वह दिन था जब देश में एक दिन में सर्वाधिक 8300 से ऊपर कोरोना के मरीज आए। पिछले 15 दिनों से देश में प्रतिदिन मरीजों की संख्या 7 हजार से ऊपर आ रही है। मतलब साफ है कि जैसे–जैसे ढील दी जा रही है मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही। देश में जब मरीजों की संख्या 500 से थोड़ा ऊपर थी तब लॉकडाउन (Lockdown) लगाया गया और जब यह संख्या दो लाख के करीब पहुंच गई तो यह पूरी तरह से खोल दिया गया।

सवाल यह है की सरकार के सामने जान और जहान दोनों को बचाने की प्राथमिकता है। इसलिए वह अपनी रणनीति के अनुसार काम कर रही है लेकिन लोगों के सामने सबसे बड़ी रणनीति अपने बचाव की होनी चाहिए न कि बेफिक्र होकर इस महामारी को बढ़ावा देने की। जहान बचाने का दबाव सरकार पर था। कारण केंद्र से लेकर राज्यों की अर्थव्यवस्था की कमर टूट रही थी और देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी भुखमरी फैल रही थी। हालांकि ढील का भी अभी बहुत ज्यादा असर नहीं दिखाई पड़ रहा है। मई माह में जब लॉकडाउन (Lockdown) मे रियायत देना शुरू हुई थी बेरोजगारी की दर 23 फीसद से ज्यादा थी।

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