ऐसी थीं देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी, गांधी जी के खिलाफ जाकर लिया बड़ा फैसला

सुचेता एक ऐसी महिला थीं, जिन्होंने देश के लिए अपने परिवार, करियर और मां बनने के सपने का त्याग कर दिया

सुचेता कृपलानी Sucheta kriplani

सुचेता कृपलानी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी तथा राजनीतिज्ञ थीं। वे भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री थीं। वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं।

स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहीं सुचेता कृपलानी किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। कृपलानी को पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। सुचेता कृपलानी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनीतिज्ञ थीं। आज इनकी जयंती है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सुचेता को कई बार जेल जाना पड़ा। देश का राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् पहली बार गाने का रिकार्ड भी सुचेता जी के नाम दर्ज है। सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कृपलानी के पिता पेशे से डॉक्टर थे। बचपन से ही अंग्रेजों की क्रूरता के खिलाफ सुचेता के मन में गुस्सा था और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनूनी जज्बा। अपनी किताब ‘ऐन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी‘ में उन्होंने बचपन के एक ऐसे ही किस्से क जिक्र किया है। सुचेता और उनकी बड़ी बहन सुलेखा एक ही स्कूल में थे। सुलेखा उनसे करीब एक डेढ़ साल बड़ी होंगी।

एक दिन उनके स्कूल की कुछ लड़कियों को कुदसिया गार्डन ले जाया गया। प्रिंस वेल्स (महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के सबसे बड़े बेटे) दिल्ली आने वाले थे, तो उनके स्वागत के लिए कुछ लड़कियों की जरूरत थी। यह सबकुछ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कुछ दिनों बाद ही हो रहा था। हर तरफ गुस्से और लाचारी का माहौल था। ऐसे समय में सुचेता और उनकी बहन सुलेखा को जब कुदसिया गार्डन के पास प्रिंस की स्वागत में खड़ी लड़कियों की पंक्ति में खड़े हो जाने का निर्देश मिला, तो वो गुस्से से लाल हो गईं पर तब विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। लाचारी और गुस्से में दोनों पीछे छिप गए पर प्रिंस का स्वागत नहीं किया। हालांकि, इसके खिलाफ आवाज ना उठा सकने के अफसोस में सुचेता सालों बाद तक इस घटना को याद कर के शर्मिंदगी महसूस करती रहीं।

उनकी शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। वह दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और बाद में पंजाब विश्वविद्यालय से पढ़ीं। जिसके बाद कृपलानी बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में संवैधानिक इतिहास की प्राध्यापक बनीं। 1936 में उनका विवाह गांधी जी के सहयोगी आचार्य जे. बी. कृपलानी से हुआ। मगर उनकी शादी आसान नहीं थी। घर वालों के साथ ही महात्मा गांधी ने भी सुचेता कृपलानी की शादी का विरोध किया था। दरअसल, जेबी कृपलानी यानी जीवतराम भगवानदास कृपलानी उम्र में सुचेता से 20 साल बड़े थे। जेबी जहां सिंधी परिवार से ताल्लुक रखते थे, वहीं सुचेता बंगाली परिवार से थीं। दोनों के उम्र और जन्म-स्थान में भले ही अंतर था लेकिन असल में दोनों एक जैसे ही थे- जुनूनी और देश के लिए मर मिटने वाले। दोनों इतने गंभीर और आत्मविश्वासी थे कि उन्हें उनके अटल निश्चय से हिला पाना मुश्किल था।

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घर वालों के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी करने का मन बना लिया। जब गांधी को इस बात की भनक लगी तो वो हैरान रह गए कि उन्हीं के आश्रम में उन दोनों का प्यार फला-फूला और उन्हें इस बात की बिल्कुल भी भनक नहीं लगी। यहां तक कि गांधी ने इस शादी पर यह कहते हुए आपत्ति जताई कि मैं अपने इतने गंभीर और दृढ़ साथी को नहीं खोना चाहता। यानी गांधीजी जेबी कृपलानी को खोना नहीं चाहते थे, उन्हें लगा कि शादी के बाद उनका ध्यान शायद आंदोलन से हट जाए, लेकिन सुचेता कृपलानी के जुनून को देखते हुए उन्होंने इस शादी को अपनी सहमति दे दी। शादी के बाद कुछ नहीं बदला। सुचेता और जेबी दोनों ने ही गांधी के दो हाथ बनकर सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन में उनका साथ दिया। साल 1940 में सुचेता ने ऑल इंडिया महिला कांग्रेस का गठन किया।

सुचेता ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लड़कियों को ड्रिल करना और लाठी चलाना सिखाया। सन 1942 में सारे बड़े नेताओं के जेल चले जाने पर उन्होंने अंडरग्राउंड रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया। सुचेता एक ऐसी महिला थीं, जिन्होंने देश के लिए अपने परिवार, करियर और मां बनने के सपने का त्याग कर दिया। उनके दिमाग में ये बातें आती ही नहीं थीं। आजादी का जुनून इतना था कि अपनी नौकरी छोड़कर गांधीजी के पास चली गईं थीं। जब वह यहां बच्चों को पढ़ाती थीं तो उनका मकसद युवाओं को देश के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना था। वो देश के भविष्य की बातें करतीं, अंग्रेजों के जुल्मों के किस्से सुनातीं, गांधीजी का जिक्र करतीं और छात्रों को आजादी संबंधित आंदोलनों में हिस्सा लेने के लिए उत्साहित करती रहतीं।

आजादी के बाद हुए पहले चुनाव में सुचेता कृपलानी नई दिल्ली लोकसभा सीट से 1952 और 57 में लगातार 2 बार सांसद चुनी गईं। इसके बाद 1962 में कानपुर से उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य चुनीं गयीं। सन 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। करीब 3 साल 162 दिनों तक वह सीएम पद पर बनी रहीं। उनके कार्यकाल के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में जो मामला था, वो था कर्मचारियों की हड़ताल। लगभग 62 दिनों तक चली इस हड़ताल का सुचेता ने बखूबी सामना किया। सुचेता में एक बेहद मंझे हुए नेता की खूबी थी। सुचेता दिल की कोमल तो थीं, लेकिन प्रशासनिक फैसले लेते समय वह दिल की नहीं, दिमाग की सुनती थीं। अंत में सुचेता ने कर्मचारियों की मांगों को पूरा किए बिना हड़ताल को तुड़वा दिया। उन्होंने साल 1971 में ही राजनीति से संन्यास ले लिया था। साल 1974 में उन्होंने आखिरी सांस ली।

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