बॉलीवुड के ‘मोगैंबो’ अमरीश पुरी अपने पहले स्क्रीन टेस्ट में हो गए थे फेल, पढ़िए मशहूर किस्से

अपनी धाकड़ अदायगी से स्क्रीन पर राज करने वाले अमरीश पुरी अपने करियर के पहले स्क्रीन टेस्ट में फेल हो गए थे। जिसके बाद उन्होंने ESIC में नौकरी शुरू कर दी थी।

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आज अमरीश पुरी साहब का जन्मदिन है

“मोगैंबो खुश हुआ” इस डायलॉग से जितनी परिचित आज की पीढ़ी है, उतना ही एक-दो दशक पहले की पीढ़ियों की जुबान पर भी यह है। भारतीय सिनेमा जगत में कुछ अभिनेता ऐसे भी हैं जिन्होंने पर्दे पर निभाए अपने किरदार को अपनी पहचान बना ली। ऐसे ही बेमिसाल अभिनेता थे अमरीश पुरी। अब वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके किरदारों ने उन्हें बखूबी हमारे बीच जिंदा रखा है। हिंदी फिल्मों के पर्दे पर विलेन के रोल में अपनी जबरदस्त आवाज और डायलॉग से लोगों के दिलो-दिमाग में सिहरन पैदा कर देने वाले अमरीश पुरी ने दर्शकों में अपनी अलग पहचान बनाई। बॉलीवुड में विलेन के तौर पर मोगैंबो और गब्बर ऐसे दो किरदार हैं जो हमेशा याद किए जाते हैं।

अमरीश पुरी ने सिर्फ विलेन के तौर पर ही नहीं, एक आदर्श पिता के रूप में भी अपनी अमिट छाप पर्दे पर छोड़ी है। फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में बोला गया उनका डायलॉग ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी..’ आज भी हर जुबान पर है। अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे करियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में ‘निशांत’, ‘गांधी’, ‘कुली’, ‘नगीना’, ‘राम लखन’, ‘त्रिदेव’, ‘फूल और कांटे’, ‘विश्वात्मा’, ‘दामिनी’, ‘करण अर्जुन’, ‘कोयला’ आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्साहित रहते थे। उनके जीवन की अंतिम फिल्म ‘किसना’ थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज हुई।

अमरीश पुरी का जन्म 22 जून, 1932 को पंजाब के जालंधर में हुआ था। शिमला के बी एम कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में वह रंगमंच से जुड़े और बाद में फिल्मों का रुख किया। रंगमंच से उनको बहुत लगाव था। अमरीश साहब ने अपने करियर की शुरुआत मराठी सिनेमा से की। साल 1967 में उनकी पहली मराठी फिल्म ‘शंततु! कोर्ट चालू आहे’ आई थी। इस फिल्म में उन्होंने एक अंधे का किरदार निभाया था। अमरीश साहब को साल 1971 में बॉलीवुड में पहला रोल मिला था, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ में। इस फिल्म में अमरीश साहब के साथ सुनील दत्त और वहीदा रहमान मुख्य भूमिका में थे। अमरीश पुरी अपने पहले स्क्रीन टेस्ट में फेल हो गए थे और उन्होंने कर्मचारी राज्य बीमा निगम श्रम और रोजगार मंत्रालय (ईएसआईसी) में नौकरी कर ली थी।

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इसी के साथ उन्होंने सत्यदेव दुबे द्वारा लिखित नाटकों में पृथ्वी थिएटर में काम करना शुरू कर दिया। ESIC में नौकरी के दौरान ही उन्हें उर्मिला दवेकर से प्यार हो गया था। थिएटर में उन्होंने महान लेखक सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के साथ काम किया। उन्हें सबसे ज्यादा याद फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में उनके मोगैंबो वाले किरदार के लिए किया जाता है। घायल में अमरीश पुरी का डायलॉग ‘जो जिंदगी मुझसे टकराती है वो सिसक-सिसस कर दम तोड़ती है’, सुनकर दर्शकों के मन में घबराहट पैदा होने लगती है। नगीना फिल्म में अमरीश पुरी का डायलॉग ‘आओ कभी हवेली पर’ लोगों के मन में डर पैदा कर देता है। इस फिल्म में अमरीश पुरी ने लंबे बालों वाले तांत्रिक का रोल प्ले किया था। अब उनका यह डायलॉग मीम्स के रूप में इंटरनेट पर छाया रहता है।

वहीं, तहलका फिल्म में डॉन्गरीला के बादशाह बने अमरीश पुरी ने लोगों को खूब डराया। वह डॉन्ग के रोल में थो जो स्कूल की बच्चियों को किडनैप करके उन्हें सुसाइड बॉम्बर बनाता था। खतरनाक हरकतों के साथ उनका डायलॉग था ‘डॉन्ग कभी रॉन्ग नहीं होता’, जिसे बोलते ही आज भी अमरीश पुरी का चेहरा लोगों को डरा जाता है। कई फिल्मों जैसे रेशमा और शेरा, सलाखें, जानी दुश्मन, नागिन, राम लखन, अंधा कानून, मशाल आदि फिल्मों में विलेन का रोल निभाने के अलावा विरासत, परदेस, इतिहास जैसी कई फिल्मों में उन्होंने पॉजीटिव रोल्स भी निभाए हैं।

घातक में सनी देओल के साथ उनके बीमार बाप के किरदार को लोगों ने खूब सराहा था। वर्ष 1979 में, रंगमंच के लिए अमरीश साहब को संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1986 में, “मेरी जंग” के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1994 में, सिडनी फिल्म महोत्सव और सिंगापुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उन्हें “सूरज का सातवां घोड़ा” के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

वर्ष 1997 में उन्हें फिल्म “घातक” के लिए स्टार स्क्रीन के सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वर्ष 1998 में फिर एक बार फिल्म “विरासत” के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अमरीश पुरी की एक्टिंग इतनी जबरदस्त थी कि उन दिनों के हॉलीवुड डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग ने उन्हें अपनी फिल्म ‘इंडियाना जोन्स: द टेंपल ऑफ डूम’ में विलेन के किरदार में कास्ट किया था। अमरीश पुरी का निधन 12 जनवरी, 2005 को 72 साल की उम्र में हो गया। वे माइलोडीस्प्लास्टिक सिंड्रोम नाम के एक ब्लड कैंसर से जूझ रहे थे।

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