पंचम दा ने बॉलीवुड में संगीत की परिभाषा ही बदल दी, बीयर की बोतल तक से निकालते थे धुन

लता का आरडी के पिता एसडी बर्मन से विवाद चल रहा था। लता उनके घर नहीं जाना चाहती थीं। पंचम दा चाहते थे कि लता उनके घर आकर रिहर्सल करें। लता ने आरडी के सामने शर्त रखी कि वे जरूर आएंगी, लेकिन घर के अंदर पैर नहीं रखेंगी।

आर डी बर्मन राहुल देव बर्मन ( Pancham) नाम बचपन में मिला था।

आर डी बर्मन को ( Pancham) नाम बचपन में मिला था।

संगीत के आसमान में ध्रुवतारे की तरह चमकते सितारे राहुल देव वर्मन, जिन्हें आर डी बर्मन के नाम से जाना जाता है। आज इनका जन्मदिन है। फिल्म इंडस्ट्री में आर डी बर्मन को सभी प्यार से पंचम दा कह कर बुलाते थे। बर्मन साहब को संगीत के नए आयाम और नए-नए प्रयोगों के लिए जाना जाता है। जिसे न तो उनके पहले किसी संगीतकार ने किया और ना ही उनके बाद। राहुल देव बर्मन ने यह साबित किया कि अगर संगीत की दुनिया में अलग मुकाम हासिल करने के लिए कुछ नया करना जरूरी है। अपने लाजवाब हुनर के जरिये आज पंचम दा हजारों नए संगीतकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। एस डी बर्मन और मीरा बर्मन के घर कलकत्ता में 27 जून, 1939 को एक पुत्र का जन्म हुआ, नाम रखा गया राहुल देव। घर में सब प्यार से पंचम बुलाते थे। कहा जाता है कि पंचम नाम अशोक कुमार साहब ने रखा था।

एक बार अशोक कुमार जब सचिन देव बर्मन के घर आये तो छोटे राहुल बार बार प प प की आवाज निकाल रहे थे तो अशोक कुमार ने सरगम के पांचवें सुर पा… से उनका नाम पंचम रख दिया। आर डी बर्मन को संगीत विरासत में मिली थी। पंचम की शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के सेंट जेवियर्स स्‍कूल में हुई। बचपन से ही हारमोनियम बजाने में उन्हें बहुत मजा आता था। उन्होंने छोटी उम्र में ही धुन बनाना शुरू कर दिया था। 10 साल की उम्र में फिल्म ‘सोलहवां सावन’ के गीत में माउथ ऑर्गन से धुन और फिल्म ‘फंटूश’ के एक गीत की धुन भी बनाई। इसके अलावा उन्होंने गुरुदत्त की मशहूर फिल्म ‘प्यासा’ के गाने ‘सर जो तेरा चकराए’ को भी चाइल्ड म्यूजिक डायरेक्टर के तौर पर कम्पोज किया था। 1959 में गुरुदत्त ने अपनी फिल्म ‘राज’ के लिए उन्हें बतौर म्यूजिक डायरेक्टर साइन किया। लेकिन फिल्म शुरू होते ही बंद हो गई।

इसके बाद पंचम को दो साल इंतजार करना पड़ा। महमूद अपनी फिल्म ‘छोटे नवाब’ के लिए एस डी बर्मन साहब को साइन करने उनके घर गए। उन दिनों सचिन साहब बहुत व्यस्त चल रहे थे। उन्होंने महमूद को यह कह कर मना कर दिया कि वो नए प्रोड्यूसर के साथ काम नहीं कर पाएंगे। महमूद साहब ने कुछ सोचा और पास बैठे आर डी बर्मन को फिल्म ऑफर कर दी। पंचम ने ये मौका हाथ से नहीं जाने दिया और फिल्म के संगीत पर काम शुरू कर दिया। राहुल साहब इस फिल्म का एक गाना लता जी के साथ करना चाहते थे। उन्होंने लता जी को अप्रोच किया। लता जी ने धुन सुना और उन्हें वह धुन इतनी पसंद आई कि फौरन हां कह दिया। गाना था- घर आजा कि घिर आये बदरा सांवरिया। इस तरह बतौर म्यूजिक डायरेक्टर पंचम की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ थी।

इस गाने के लिए आरडी चाहते थे कि लता उनके घर आकर रिहर्सल करें। लता धर्मसंकट में फंस गईं क्योंकि उस समय उनका कुछ कारणों से आरडी के पिता एसडी बर्मन से विवाद चल रहा था। लता उनके घर नहीं जाना चाहती थीं। लता ने आरडी के सामने शर्त रखी कि वे जरूर आएंगी, लेकिन घर के अंदर पैर नहीं रखेंगी। मजबूरन आरडी अपने घर के आगे की सीढि़यों पर हारमोनियम बजाते थे और लता गीत गाती थीं। पूरी रिहर्सल उन्होंने ऐसे ही की। आर डी बर्मन की करियर की शुरूआत में लता मंगेशकर का बड़ा योगदान रहा है। उनके द्वारा बनाए गए संगीत उनके पिता एस डी बर्मन के संगीत की शैली से काफी अलग थे। आर डी बर्मन हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत का भी मिश्रण करते थे, जिससे भारतीय संगीत को एक अलग पहचान मिलती थी। इसलिए उस दौर में पंचम को युवाओं का संगीतकार कहा जाता था।

वहीं, उनके पिता सचिन देव बर्मन को पाश्चात्य संगीत का मिश्रण रास नहीं आता था। 1970 में आरडी ने देवआनंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के लिए ‘दम मारो दम’ गीत बनाया जो आज भी उतने ही चाव से सुना जाता है। यह गाना फिल्‍म पर भारी न पड़ जाए इसी डर से देव आनंद ने पूरा गाना फिल्‍म में नहीं रखा। इस गाने ने बॉलीवुड में भूचाल ला दिया था और ऐसा रॉक नम्बर हिंदी फिल्मों में शायद ही पहले आया हो। लेकिन ‘दम मारो दम’ की धुन सुन सचिन देव बर्मन इतने दु:खी हुए कि रिकॉर्डिंग स्टूडियो से उठकर चले गए। वे इस बात से खिन्न थे कि राहुल ने उनकी (सचिन देव बर्मन) शैली त्याग दी थी। आरडी बर्मन माउथ ऑर्गन बहुत अच्छा बजाते थे। राहुल ने कई बार कंघी, कप-प्लेट्स, बोतल आदि से निकली आवाजों को अपने गीतों में शामिल किया।

उन्होंने अपने फिल्मी करियर में हिन्दी के अलावा बंगला, तमिल, तेलगु और मराठी में भी काम किया है। इसके अलावा उन्होंने अपने आवाज का जादू भी बिखेरा। शोले फिल्म के ‘महबूबा-महबूबा’ गाने को कौन भूल सकता है। बतौर संगीतकार आर डी बर्मन की पहली हिट फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ थी। आर डी बर्मन ने इसका श्रेय गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को दिया। सत्तर के दशक के आरंभ में आर डी बर्मन भारतीय फिल्म जगत के एक लोकप्रिय संगीतकार बन गए थे। उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार जैसे बड़े फनकारों से अपने फिल्मों में गाने गवाए। 1970 में उन्होंने 6 फिल्मों में अपनी संगीत दी, जिसमें ‘कटी पतंग’ काफी सफल रही। यहां से आर डी बर्मन संगीतकार के रूप में काफी सफल हुए। बाद में ‘यादों की बारात’, ‘हीरा पन्ना’, ‘अनामिका’ जैसी बड़ी फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया।

राहुल देव बर्मन ने गीतकार गुलजार के साथ अपने करियर के बेहतरीन गीत दिए। गुलजार के लिखे कठिन गीतों को उन्होंने अपनी धुनों से इतना सुरीला बना दिया कि खुद गुलजार चकित रह जाते थे। फिल्म ‘इजाजत’ के लिए गुलजार ने ‘मेरा कुछ सामान’ लिखा। आरडी के सामने जब यह गीत लाया गया तो उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि अखबार की खबर मेरे सामने रख दी हो और इस पर धुन बनाने को कहा जा रहा हो। बहरहाल, फिर आरडी ने ऐसी बेहतरीन धुन बनाई कि गायिका आशा भोसले को कई पुरस्कार इस गीत के लिए मिले।

पंचम की शादी रीता पटेल से 1966 में हुई थी। रीता और पंचम की मुलाकात दार्जिलिंग में हुई थी। बताते हैं कि रीता ने अपनी सहेलियों से यह शर्त लगाई थी कि वह पंचम के साथ फिल्म देखने जाएंगी। रीता इसमें सफल हो गईं और दोनों के दिल मिल गए। हालांकि, इनकी शादी ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल पाई 1971 में दोनों का तलाक हो गया। बाद में साथ काम करते हुए सिंगर आशा भोसले के साथ उनकी नजदीकियां बढ़ गईं और 1980 में दोनों ने शादी कर ली।

80 के दशक के अंत में एक ऐसा दौर आया जब फिल्मकारों ने नए म्यूजिक डायरेक्टरों के आने के बाद पंचम से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसी बीच उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह अपने अंतिम समय में अस्पताल पहुंच गए। हालांकि, अस्पताल में होने के बाद भी पंचम का म्यूजिक से नाता नहीं टूटा और वह वहीं से गानों की धुनें बनाते रहते थे। बतौर संगीतकार राहुल देव बर्मन फिल्मफेअर अवॉर्ड्स के लिए 17 बार नॉमिनेट हुए थे। उन्हें तीन बार, सनम तेरी कसम (1983), मासूम (1984) और 1942 : ए लव स्टोरी (1995) के लिए यह अवॉर्ड मिला। पंचम की आखिरी फिल्म ‘1942 अ लव स्टोरी’ उनके देहांत के बाद रिलीज हुई थी। इस फिल्म के बेहतरीन म्यूजिक के लिए उन्हें मरणोपरांत फिल्मफेयर के बेस्ट म्यूजिशन का अवॉर्ड मिला था। 4 जनवरी, 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक ढेर सारे गीत वो दे गए।

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