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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) एक प्रतिभाशाली कलाकार थे।

बता दें कि नक्सलबाड़ी वो जगह है, जहां से भारत में नक्सलवाद मूवमेंट की शुरुआत हुई थी। ये जगह पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले में है।

किशोर कुमार (Kishore Kumar) की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फिल्म 'शिकारी' (1946) से हुई। इस फिल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।

मोहम्मद रफी (Mohammad Rafi) की आवाज के बिना हिंदी संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनके शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों की अद्भुत दुनिया है।

Kargil Viyay Diwas: भले ही 1999 के युद्ध में शामिल कुछ वीर योद्धा हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके पराक्रम और साहस को सुनकर भारत के हर नागरिक सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। आज हम आपको कारगिल युद्ध 1999 पर बनी कुछ फिल्मों के बताते हैं।

आप जब भी मनोज कुमार (Manoj Kumar) को याद करेंगे तो उनसे ज्यादा उनकी फिल्मों के दूसरे चरित्र ज्यादा याद आते हैं, जो उनसे ज्यादा सशक्त दिखाई देते हैं उनकी सबसे ज्यादा लोकप्रिय फिल्म 'उपकार' का उदाहरण लीजिए। उपकार को याद करने पर मनोज कुमार नहीं, प्राण ज्यादा याद आते हैं। वह ईमानदार, भावुक, साहसी और अपंग चरित्र।

1965 में आई फिल्म भूत बंगला से महमूद (Mehmood) ने फिल्म डायरेक्शन में कदम रखा। 1974 में आई फिल्म कुंवारा बाप को उन्होंने डायरेक्ट किया था। इसके अलावा कई फिल्मों में उन्होंने बतौर सिंगर भी अपनी आवाज दी।

मुकेश (Mukesh) ने दिल की गहराइयों में उतर जाने वाली अपनी सधी हुई आवाज में न केवल प्रेम के दुःख, दर्द, निराशा और विरह की गहनतम भावनाओं को अपना स्वर दिया, बल्कि हल्के- फुल्के अंदाज के हास्य, उमंग और मिलन के गीत भी गाए।

मुंबई में आनंद बख्शी मुलाकात फिल्म 'बड़ा आदमी' (1956) के निर्देशक भगवान दादा से हुई, जो गीतकार ढूँढ़ रहे थे और उन्होंने आनंद (Anand Bakshi) से कहा कि वह उनकी फिल्म के लिए गीत लिख दें। इसके लिए वह उनको रुपए भी देने को तैयार हैं। लेकिन उन्हें तब तक गीतकार के रूप में संघर्ष करना पड़ा जब तक सूरज प्रकाश की फिल्म 'मेहंदी लगी मेरे हाथ' (1962) और 'जब-जब फूल खिले' (1965) परदे पर नहीं आई।

मां बनने के बाद कानन देवी (Kanan Devi) ने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और समाज सेवा के कार्यों में व्यस्त रहने लगीं। उन्होंने जरूरतमंद महिलाओं की सहायता के लिए 'महिला शिल्पी महल' नामक एक समाज सेवी संस्था बना ली और समाज सेवा के कार्यों जुड़ गई।

कैटरीना (Katrina Kaif) की परवरिश मिश्रित संस्कृति में हुई है। उनके पिता मूलत: कश्मीर के हैं, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता स्वीकार कर ली है, जबकि कैटरीना की माँ ब्रिटेन की हैं। लंदन और हवाई द्वीप में पली-बढ़ी कैटरीना अंतर्राष्ट्रीय स्तर की मॉडल भी रह चुकी हैं।

मदन मोहन से आशा भोंसले को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि आप अपनी हर फिल्मों के लिए लता दीदी को हीं क्यों लिया करते हैं, इस पर मदन मोहन कहा करते थे कि जब तक लता जिंदा है मेरी फिल्मों के गाने वही गाएगी।

कहा जाता है कि फिल्म निर्माता-निर्देशक और अभिनेता किशोर साहू ने कृष्णा को एक नाटक में देखा था। वह उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। किशोर साहू ने कृष्णा को बीना राय (Bina Rai) नाम दिया। ‘

हिंदी फिल्मों में नायक केंद्रित कथानकों का ही जोर रहा है, लेकिन 'बिमल दा' ने उसे भी खारिज कर दिया और नायिकाओं को केंद्रित कर बेहद कामयाब फिल्में बनाई। ऐसी फिल्मों में मधुमती', 'बंदिनी', 'सुजाता', 'परिणीता', 'बेनजीर', 'बिराज बहू' आदि शामिल हैं। सामाजिक समस्याओं से रू-ब-रू कराते हुए भी बिमल रॉय  (Bimal Roy) भारतीय मूल्यों और परंपराओं को भूलते नहीं दिखते।

जोहरा सहगल ने किसी से कहा था, 'तुम अब क्या मुझे इस तरह से देखते हो जब मैं बूढ़ी और बदसूरत हो गई हूं। तब देखते, जब मैं जवान और बदसूरत थी।'

बगैर संवाद बोले सिर्फ आंखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाए।

बॉलीवुड में शायद ही ऐसा कोई बड़ा स्टार हो जिसे सरोज ने डांस न कराया हो। हर किसी को अपनी ताल पर नचाने वाली सरोज आज पूरे देश में ‘डांस मास्टर’ के नाम से जानी जाती हैं।

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