सच के सिपाही

पति की शहादत का जख्म अभी भरा ही नहीं था कि नवजात बच्चे को भी आगे चलकर भविष्य में सेना में भेजने की बात बड़े गर्व से कर रही हैं। यही तो सच्ची राष्ट्रभक्ति है।

जम्मू से कश्मीर के लिए रवाना होने से पहले बबलू सांतरा ने अपनी पत्नी को फोन किया था। उन्होंने कहा था कि एक घंटे के बाद वह कश्मीर पहुंच जाएंगे। उसके बाद फिर पत्नी को फोन करेंगे लेकिन दोबारा फोन तो जरूर आया लेकिन बबलू का नहीं बल्कि CRPF का जिसमें उनके शहीद होने की खबर आई।

सिवाचंद्रन का दो साल का एक बेटा है। उनकी पत्नी चार माह की गर्भवती हैं। इनके घर में अब कमाने वाला कोई नहीं है। सिवाचंद्रन के छोटे भाई की पिछले साल करंट लगने से मौत हो गई थी। उनकी बहन बोल नहीं सकतीं। वह अभी अविवाहित हैं। पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिवाचंद्रन के कंधों पर ही थी।

मेजर ढौंडियाल की मां दिल की मरीज हैं। इसलिए उन्हें इस बारे में नहीं बताया गया था। बस इतना कहा गया था कि विभूति घायल हैं। उन्हें सबसे आखिर में बेटे की शहादत की सूचना दी गई।

शहीद मेजर चित्रेश सिंह बिष्ट 7 मार्च को होनेवाली अपनी शादी के लिए 28 फरवरी को घर आने वाले थे। आतंकवाद का दिया इससे बड़ा ज़ख्म और क्या हो सकता है। परिवार जहां बेटे के शादी में आने का इंतज़ार कर रहा था, आज पार्थिव शरीर का इंतज़ार कर रहा है।

कविता को गुरू का फोन आया था लेकिन वे उठा नहीं पाई थीं। जब उन्होंने वापस फोन किया तो गुरू का फोन पहुंच से बाहर आ रहा था। कविता के पास अपने पति से बात करने का आखिरी मौका था। लेकिन उनकी किस्‍मत में शायद ये था ही नहीं।

छुट्टी बिताकर ड्यूटी पर जाते हुए मानेश्वर ने परिवार के लोगों से बातचीत करते हुए कहा था कि मेरी फोटो खींच कर रख लो पता नहीं कब बम विस्फोट हो और मैं चला जाऊं। क्या पता था कि उनकी यह बात सच हो जाएगी।

वसंत कुमार के परिवार पर यह दूसरी बार दुखों का पहाड़ टूटा है। वसंत के पिता वासुदेवन का छह माह पहले ही निधन हुआ है। तरक्की और बटालियन में बदलाव के बाद वसंत की कश्मीर में तैनाती हुई थी। इससे पहले वह पंजाब में तैनात थे।

अश्विनी का परिवार बहुत ग़रीब है। उनके माता-पिता और तीन भाई दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार का खर्च चलाते हैं। इस वर्ष के अंत में उनकी शादी होने वाली थी।

अभी 16 जनवरी को ही मनोज ने बेटी का पहला जन्मदिन मनाया था और छह फरवरी को वे वापस ड्यूटी पर कश्मीर चले गये थे। मनोज ने श्रीनगर पहुंचकर वापस फिर से कॉल करने का वादा किया था।

सरकार ऐसा कदम उठाए, जिससे दोबारा फिर कभी भी किसी जवान को इस तरह से अपनी जान ना गंवानी पड़े।

विजय के बड़े बेटे को पिता को खोने का दुख है। पर अब वह भी सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहता है। 14 फरवरी को उसका जन्मदिन था और उसी दिन पिता शहीद हो गये। शहीद होने से पहले विजय ने बेटे को जन्मदिन की शुभकामना दी थी।

शहीद रमेश यादव के बेटे आयुष का पैर जन्म से ही टेढ़ा है, जिसका इलाज कराना है। पर डेढ़ साल के बेटे को क्या पता था कि पापा की जगह उनके शहादत की ख़बर आएगी। बेटे का इलाज कराने का वादा करके निकले रमेश को नहीं पता था कि वह अब कभी वापस नहीं आयेंगे।

शहीद तिलक राज के 22 दिन के बेटे ने तो अबतक अपने पिता को ठीक से पहचाना भी नहीं है। उनके जाने के तीन दिन बाद ही उसकी पत्नी को यह मनहूस खबर मिली कि उसका सुहाग उजड़ गया है। तिलक को लोकगायकी का भी शौक था। ड्यूटी के दौरान सीमा पर देश की रक्षा करने वाले तिलक घर पहुंचने पर गाने रिकॉर्ड करते थे। उन्होंने कई पहाड़ी गाने गाए हैं।

तक़दीर का फैसला देखिए कि नसीर ख़ुद बचपन में अनाथ हो गए थे और आज इनके दोनों बच्चे भी अनाथ हो गए।

नितिन शिवाजी राठौर परिवार में कमाने वाले एकमात्र सदस्य थे। किसान परिवार से आने वाले राठौर 2006 में सेना में भर्ती हुए थे। शहादत की खबर सुनकर बूढ़े माता-पिता और परिवार टूट गया है। वहीं संजय राजपूत ने कश्मीर, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर में अपनी सेवाएं दी थीं। उन्होंने सीआरपीएफ में अपनी सेवा और पांच साल के लिए बढ़वा ली थी।

मोहनलाल हमेशा देश की रक्षा को लेकर बच्चों से बातें करते थे। छत्तीसगढ़ में नक्सली क्षेत्र हो या फिर जम्मू के आतंकी क्षेत्र वहां के कई किस्से उन्होंने बच्चों को सुनाए थे। दिसंबर में जब वे घर गए थे तो परिजनों ने उन्हें वीआरएस लेने का सुझाव दिया था। पर उन्होंने कहा कि देश को हमारी जरूरत है। देश की सेवा पूरी करने के बाद ही सेवानिवृत्त होंगे।

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