सच के सिपाही

1999 में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय चलाया गया था। करीब 18000 फीट की ऊंचाई पर कारगिल में यह जंग लड़ी गई थी।

बसंती के मुताबिक, उनके पिता फेदलिस एक्का भारतीय जवान थे। वे 31 साल पहले श्रीलंका में शहीद हो गये थे। लेकिन आज तक शहीद के आश्रितों को किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है।

शहीद की पत्नी अन्नू कंवर अपना शहीद पति के हक और सम्मान के लिए आज एक साल बाद भी प्रशासन का मुंह देख रही है। आज भी उसे राज्य सरकार की ओर से शहीद स्मारक के लिए भूमि आवंटन, स्मारक निर्माण और मूर्ति लगाए जाने का इंतजार है।

स्क्वॉड्रन लीडर समीर अबरोल के साथ इस दुर्घटना में देहरादून के स्क्वॉड्रन लीडर सिद्धार्थ नेगी भी शहीद हो गए थे। इसके कुछ दिनों बाद गरिमा अबरोल ने एक भावुक फेसबुक पोस्ट करके अपने गम बयां करने के साथ-साथ व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया था।

बलूच रेजिमेंट बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन गई। चूंकि उस दौर में सेना में बहुत ही कम मुसलमान थे। जब बंटवारा हुआ तो मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमान होने की वजह से ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को पाकिस्तान ले जाना चाहते थे।

20 साल पहले करगिल युद्ध में देहरादून का एक लाल रमेश थापा शहीद हो गया था। करगिल युद्ध में देहरादून के गलज्वाड़ी के रहने वाले शहीद रमेश थापा के परिवार और उनके आश्रितों के लिए सरकार ने उस समय कितनी ही घोषणाएं की थीं।

घातक कमांडो मुख्य रूप से एक ‘Shock Troop‘ यानी दुश्मन को चौंका देने वाली टुकड़ी की तरह काम करती है। इसके जवान बटालियन की सबसे अगली पंक्ति में तैनात रहते हैं।

एनएसजी गृह-मंत्रालय के तहत सात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) में से एक है। एनएसजी का गठन भारत की विभिन्न फोर्सेज से विशिष्ट जवानों को छांटकर किया जाता है।

वर्ष 1999 में पड़ोसी मुल्क से आए दुश्मनों ने हमारे देश की तरफ नजर उठाकर देखने की गुस्ताखी की थी। इस युद्ध में देश के वीर जवानों ने दुश्मनों को धूल चटाया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

नक्सलियों ने कायरता पूर्ण कार्रवाई करते हुए नीरज की पीठ में गोली मारी थी लेकिन बहादुर नीरज गोली लगने के बावजूद घंटों नक्सलियों से लड़ते रहे। लड़ते-लड़ते नीरज छेत्री मौके पर ही शहीद हो गए।

14 फरवरी, 2019 को जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में हमारे 40 जवान शहीद हुए थे। कई जवान जख्मी भी हुए थे। इस घटना से पूरे देश में रोष और संवेदना की लहर फैल गई थी।

एक जवान ने देखा कि नियंत्रण रेखा के करीब 8 किलोमीटर दूर हसमत पूरा क्षेत्र में कुछ आतंकवादी छिपे हुए हैं। सेना के जवानों ने इन आतंकियों को चारों तरफ से घेर लिया। खुद को घिरा महसूस करते ही आतंकवादियों ने पुलिस पर गोले बरसाने शुरू कर दिए।

दुश्मन की एक गोली आबिद के पैर में लग गई। असहनीय दर्द और बुरी तरह घायल होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत न हारते हुए आगे बढ़कर एक साथ 32 फायर झोंक दिए। आबिद के इस ताबड़तोड़ हमले में एक साथ 17 पाक सैनिकों की लाशें बिछ गईं।

अपने प्राणों की चिंता न करते हुए अब्दुल हमीद ने अपनी "गन माउन्टेड जीप" को एक टीले के समीप खड़ा कर दिया और गोले बरसाते हुए शत्रु के तीन टैंक ध्वस्त कर डाले। वीर हमीद की शहादत ने यह सन्देश भी दिया कि केवल साधनों के बलबूते युद्ध नहीं जीता जाता।

जल्द ही घर आने वाले थे महादेव पाटिल, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।

मदनपाल सिंह साल 1986 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे और वे सीआरपीएफ में एसआइ के पद पर थे।

अपनी साफगोई और खरी-खरी सुनाने से सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw) कभी बाज नहीं आते थे। चाहे फिर सामने भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ही क्यों न हों।

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