1962 का युद्ध: रेजांगला दर्रे पर चीन के 1300 सैनिकों को हमारे 120 जवानों ने कर दिया था ढेर, जानें पूरा कहानी

चीनी सेना का उद्देश्य रेजांगला दर्रे पर कब्जा कर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चुशूल गैरिसन का लेह से एकमात्र सड़क संपर्क तोड़ना था।

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फाइल फोटो

चीनी सेना का उद्देश्य रेजांगला दर्रे पर कब्जा कर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चुशूल गैरिसन का लेह से एकमात्र सड़क संपर्क तोड़ना था। रेजांगला पोस्ट पर उस समय भारतीय 13 कुमाऊं रेजीमेंट की एक कंपनी तैनात थी।

भारतीय सेना का जब भी जिक्र होता है तो बलिदान, शौर्य और पराक्रम की याद आती है। भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के दौरान भी हमारे जवानों ने ऐसा पराक्रम दिखाया था जिसे यादकर हर किसी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

इस युद्ध में चीन के फौजियों की संख्या करीब 6000 थी जबकि 13 कुमाऊं के 120 जवान थे। चीनी सैनिकों के पास बड़ी मात्रा में तोप और गोले थे जबकि भारतीय सैनिकों के पास सीमित मात्रा थी। 13 कुमाऊं की इस टुकड़ी को भारतीय सेना की ओर से भी मदद नहीं मिल पाई थी लेकिन फिर भी चीन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया गया था।

दरअअसल 18 नवंबर 1962 की रात को चीन की सेना ने रेजांगला स्थित भारतीय पोस्ट पर, अचानक दो तरफा हमला बोल दिया था। युद्ध के दौरान रेजांगला की लड़ाई लद्दाख के सुदूर इलाके मे स्थित 18,000 फीट की ऊंची दुर्गम बर्फीली चोटी पर लड़ी गई थी।

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चीनी सेना का उद्देश्य रेजांगला दर्रे पर कब्जा कर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चुशूल गैरिसन का लेह से एकमात्र सड़क संपर्क तोड़ना था। रेजांगला पोस्ट पर उस समय भारतीय 13 कुमाऊं रेजिमेंट की एक कंपनी तैनात थी। भारतीय सैनिक चौकन्ने थे तो ऐसे में उन्होंने दुश्मनों को मुंह तोड़ जवाब दिया था।

नतीजन चीनी सेना को इस दौरान भारी नुकसान के बाद पीछे हटना पड़ा। लेकिन चीनी सेना ने फिर से अपने सैनिकों को संगठित किया और ज्यादा फोर्स के साथ भारतीय सेना पर चौतरफा धावा बोल दिया था।

इस दौरान सेना के साथ कम्यूनिकेशन माध्यमों को भी काट दिया गया था। इसके बावजूद अलग-थलग पड़ चुके 13 कुमाऊं के जवानों ने पूरे जोश और उत्साह से चीनी हमलावरों का सामना किया और उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।

अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में अतुलनीय वीरता तथा दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए 13 कुमाऊं के सैनिकों ने ‘अंतिम गोली और अंतिम सांस’ तक लड़ते हुए भारतीय सैन्य परंपरा में एक नया इतिहास रच दिया था। इस लड़ाई में भारत के 120 जवानों ने 1,300 चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया था।

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