30 पर भारी हैं ये 3 DRG महिला कमांडोज, थर-थर कांपते हैं नक्सली

यह तीनों जब एक साथ रणभूमि में खड़ी हो जाती हैं तो नक्सलियों के पसीने छूटने लगते हैं। खासकर उस वक्त जब इनके हाथों में बंदूक हो तो वो नक्सलियों के लिए काल बन जाती हैं। बीहड़ों में छिपे नक्सली इन तीनों महिलाओं से इसलिए थर्र-थर्र कांपते हैं क्योंकि यह तीनों बीहड़ों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं।

DRG

कोसी, कविता और फूलो।

आज हम बात कर रहे हैं तीन बहादुर महिलाएं कोसी, कविता कश्यप और फुलो की। छत्तीसगढ़ के बस्तर में यह तीनों District Reserve Guards यानी डीआरजी (DRG) की टीम की अहम हिस्सा हैं।

यह तीनों जब एक साथ रणभूमि में खड़ी हो जाती हैं तो नक्सलियों के पसीने छूटने लगते हैं। खासकर उस वक्त जब इनके हाथों में बंदूक हो तो वो नक्सलियों के लिए काल बन जाती हैं। बीहड़ों में छिपे नक्सली इन तीनों महिलाओं से इसलिए थर्र-थर्र कांपते हैं क्योंकि यह तीनों बीहड़ों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं।

आज हम बात कर रहे हैं तीन बहादुर महिलाएं कोसी, कविता कश्यप और फुलो की। छत्तीसगढ़ के बस्तर में यह तीनों District Reserve Guards यानी डीआरजी (DRG) की टीम की अहम हिस्सा हैं। यह तीनों एंटी नक्सल ऑपरेशन में पारा मिलिट्री फोर्स के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलकर काम करती हैं।

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साल 2016 में एक एंटी-नक्सल अभियान में डीआरजी (डिस्ट्रीक्ट रिजर्व गार्ड्स) की इन्हीं तीनों महिला कमांडो ने मिलकर 2 नक्सलियों को मार गिराया था। उस वक्त यह तीनों DRG की असिस्टेंट कॉन्सटेबल थीं। बस्तर में यह पहली बार था, जब महिला कमांडोज ने एंटी नक्सल ऑपरेशन में पुलिस का साथ दिया और सिर्फ साथ ही नहीं दिया बल्कि दो नक्सलियों का काम तमाम किया तथा नक्सलियों के दिलों में अपने नाम का खौफ भर दिया।

कौन हैं कोसी, कविता और फूलो?

छत्तीसगढ़ के बीहड़ों में ‘ट्रिपल वुमन पावर’ की खूब चर्चा होती है। इनकी बहादुरी के बारे में कहा जाता है कि अगर यह तीनों एक साथ बंदूक उठा लें तो वो 30 पर भी भारी पड़ जाएं। एक वक्त था जब कोसी, फुलो और प्रोमिला कभी खूंखार नक्सली थीं।

जी हां, यह तीनों कभी पुलिस के खिलाफ लड़ने वाली और पुलिस की सबसे बड़ी दुश्मन थीं। नक्सली संगठन के बहकावे में आकर इन तीनों ने जंगलों में रह कर न जाने कितने गुनाह किए। लेकिन धीरे-धीरे इन्हें यह एहसास होने लगा कि वो एक गलत विचारधारा के दलदल में फंस गई हैं। हर वक्त छिपकर रहना, पुलिस से बचकर भागते रहना और बेगुनाह को हथियार के दम पर धमकाना यह सभी बातें उन्हें अपराध बोध कराने लगीं।

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आखिरकार साल 2015 में इन तीनों ने पुलिस के सामने हथियार डाल दिया। प्रशासन ने भी इनकी भरपूर मदद की और फिर इन्होंने पुलिस फोर्स ज्वॉइन करने की इच्छा जताई। लिहाजा यह तीनों ही डीआरजी में शामिल हो गईं।

यहां बता दें कि डीआरजी (DRG) स्थानीय स्तर पर जवानों और सरेंडर किए हुए नक्सलियों को भर्ती कर नक्सलियों से निपटने के लिए बनाया गया एक खास पुलिस बल है। स्थानीय होने की वजह से डीआरजी में शामिल होने वाले लोगों को ‘Son Of Soils’ भी कहा जाता हैं।

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कड़ी ट्रेनिंग से गुजरीं:

डीआरजी (DRG) में भर्ती होने के बाद इन तीनों को घने जंगलों में जाकर नक्सलियों से लोहा लेने के लिए खास और बेहद ही कड़ी ट्रेनिंग दी गई। चूंकि ये पहले नक्सल संगठन का हिस्सा थीं इसलिए नक्सलियों की हर प्लानिंग, हर चाल के बारे में इनसे बेहतर और कौन जान सकता था? साथ ही ये स्थानीय लोगों से आसानी से बातचीत कर सकती थीं और उन्हें अपनी बात समझा भी सकती थीं।

कड़ी ट्रेनिंग से गुजरने के बाद इन तीनों ने अपने पहले ही मिशन में नक्सलियों को नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया। नक्सलियों के मंसूबों को नाकाम करने और उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देने में यह तीनों ही महिलाएं काफी ट्रेन्ड हैं। आज कोसी, फुलो और प्रोमिला को खुद पर गर्व महसूस है और वो हर वक्त सरकार तथा प्रशासन की मदद करने और अपनी ड्यूटी के लिए तैनात रहती हैं।

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