Pulwama Attack: बरसी पर बरसा शहीद के परिवार का गुस्सा, आ गई है अनशन पर बैठने की नौबत

पुलवामा में पिछले साल हुए आतंकी हमले (Pulwama Attack) में शहीद हुए जवानों को लेकर उस वक्त बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं। सरकार और प्रशासन ने तमाम वादे किए थे, लेकिन कुछ वक्त बाद इन वादों को भूला दिया गया।

Pulwama Martyr Mahesh Yadav

Pulwama Martyr Mahesh Yadav

पुलवामा में पिछले साल हुए आतंकी हमले (Pulwama Attack) में शहीद हुए जवानों को लेकर उस वक्त बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं। सरकार और प्रशासन ने तमाम वादे किए थे, लेकिन कुछ वक्त बाद इन वादों को भुला दिया गया। पुलवामा हमले में प्रयागराज के शहीद महेश यादव (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के परिवार को आज तक न तो पेंशन मिली, न सरकारी नौकरी।

Pulwama Martyr Mahesh Yadav
शहीद के परिवार से किए वादे नहीं हुए पूरे।

पुलवामा में पिछले साल हुए आतंकी हमले (Pulwama Attack) में शहीद हुए जवानों को लेकर उस वक्त बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं। सरकार और प्रशासन ने तमाम वादे किए थे, लेकिन कुछ वक्त बाद इन वादों को भुला दिया गया। पुलवामा हमले में प्रयागराज के शहीद महेश यादव (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के परिवार को आज तक न तो पेंशन मिली, न सरकारी नौकरी। शहीद के सम्मान में न तो कोई मूर्ति लगी, न सड़क बनी और न ही स्कूल खुला। शहीद के बच्चों की शिक्षा के लिए भी सरकार और प्रशासन की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया।

अनशन पर बैठने को होंगे मजबूर

बरसी के मौके पर महेश (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के परिवार वालों को न होने का गम तो है ही, साथ ही प्रशासन की बेरुखी का मलाल भी है। महेश की शहादत के बाद उनके पिता परिवार के दूसरे बच्चों को भी देश की सेवा के लिए फौज में भेजने का एलान कर रहे थे। लेकिन नेताओं और अफसरों के यहां बार-बार चक्कर लगाने के बाद वह इस कदर मायूस हो चुके हैं कि लखनऊ में अनशन शुरू करने की बात कह रहे हैं। पुलवामा हमले की बरसी पर शहीदों के परिवार के प्रति प्रशासन की यह लापरवाही मायूस करने वाली तो है ही।

प्रशासन की लापरवाही से दुखी शहीद महेश (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के पिता राजकुमार और परिवार वालों का कहना है कि वह भीख नहीं मांग रहे हैं। सिर्फ किए गए वादों के पूरा होने की उम्मीद कर रहे हैं। परिवार वालों ने बरसी के मौके पर भारी मन से यह एलान किया है कि अगर एक महीने में उनसे किए वादों को पूरा नहीं किया जाता है तो वह लोग 15 मार्च से लखनऊ में सीएम ऑफिस के बाहर अनशन पर बैठने को मजबूर होंगे।

परिवार का इकलौता सहारा थे महेश

बता दें कि पिछले साल पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद 40 जवानों में से प्रयागराज के मेजा इलाके के रहने वाले महेश यादव भी शामिल थे। सीआरपीएफ (CRPF) की 118वीं बटालियन में कांस्टेबल के पद पर तैनात महेश यादव अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उन पर अपने बूढ़े बीमार माता-पिता, दादा, पत्नी और दो बेटों के साथ ही छोटे भाई और बहन की जिम्मेदारी थी। घर का खर्च भी मुश्किल से चलता था।

हमले के कुछ घंटे बाद ही गांव में महेश की शहादत की खबर आई तो कोहराम मच गया था। गांव ही नहीं आस-पास के तमाम इलाकों में भी मातम पसरा हुआ था। हर कोई इस बेटे की शहादत पर आंसू बहा रहा था। पत्नी संजू, बहन संजना और मां शांति देवी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। पांच और छह साल के बेटों साहिल और समर तो समझ ही नहीं पा रहे थे कि पिता का साया उनके सर से हमेशा के लिए उठ चुका है।

महेश की शहादत का ऐसा सम्मान देख पिता का सीना हो गया था चौड़ा

जवान बेटे की अर्थी को कंधा देने वाले महेश (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के पिता राजकुमार ने उस वक्त रुंधे हुए गले से यह एलान किया था कि उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके बेटे ने देश के लिए कुर्बानी दी है। उन्होंने यह भी कहा था एक बेटे को खोने के बावजूद वह छोटे बेटे अमरेश और बड़ा होने पर महेश के दोनों बेटों को भी देश सेवा के लिए फौज में भेजेंगे। उस वक्त उनके घर मंत्रियों-सांसदों और दूसरे नेताओं के साथ ही तमाम अफसरों व अन्य लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था।

सरकार और प्रशासन ने उनके परिवार को मदद देने और महेश यादव (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) की शहादत का सम्मान करने के लिए तमाम वादे किए थे। परिवार वालों को उस वक्त यह एहसास हो रहा था कि देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले महेश की शहादत का ऐसा सम्मान होगा, जिसे देखकर उनका सीना हमेशा गर्व से चौड़ा होता रहेगा। लेकिन उन्हें शायद इस बात का कतई एहसास नहीं था कि नेताओं और अफसरों के वादे झूठे साबित होंगे।

किए गए थे तमाम वादे, एक भी नहीं हुआ पूरा

अंतिम संस्कार से पहले महेश के परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी देने, दूसरे पर भी गम्भीरता पूर्वक विचार करने, हाइवे से घर तक पक्की सड़क बनवाने, घर के पास हैंडपंप लगवाने, बच्चों को मुफ्त पढ़ाई कराने, पत्नी को पेंशन देने, खेती के लिए डेढ़ एकड़ जमीन दिए जाने, महेश के सम्मान में गांव में उनकी मूर्ति लगाने, शहीद स्मारक बनाए जाने और शहीद के नाम पर किसी स्कूल या कालेज का नामकरण किये जाने समेत तमाम वादे किए गए थे, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी परिवार को आर्थिक मदद के अलावा आज तक कोई और मदद नहीं मिली।

सरकारी दफ्तरों के काटे चक्कर, सबने किया अनसुना

छोटे भाई व पत्नी को न तो नौकरी मिली और न ही बच्चों की फीस माफ हुई। महेश (Pulwama Martyr Mahesh Yadav) के सम्मान में न तो कोई मूर्ति लगी है और न ही कोई गेट बनाया गया। उनके नाम पर कोई स्कूल कालेज भी नहीं खुला। परिवार को पेट्रोल पम्प देने के वादे पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही खेती के लिए डेढ़ एकड़ जमीन देने के वादे का कुछ हुआ। शहीद के पिता राजकुमार यादव और छोटे भाई अमरेश के मुताबिक, महेश की तेरहवीं के बाद आज तक कोई भी अधिकारी उनकी खबर लेने नहीं गया। एक साल में उन्होंने सरकारी दफ्तरों के खूब चक्कर भी लगाए। वहां या तो कोई मिलता नहीं है या फिर टालमटोल कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है।

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