Kargil Vijay Diwas: ब्रिगेडियर कारिअप्पा की वीरगाथा, हथियारों की कमी के बाद भी ऐसे जीती जंग

पूरे 21 साल पहले हुए कारगिल युद्ध को यादकर ब्रिगेडियर कारिअप्पा की आंखे नम हो जातीं हैं।

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भारतीय सेना के जवान। (फाइल फोटो)

कई भारतीय जवान घायल हो चुके थे। कैप्टन ने मदद के लिए रेडियो सेट पर बोफोर्स के लिए आर्टिलरी अफसर से बात की, पर अफसर ने उन्हें मना कर दिया।

26 जुलाई 1999, ये वो दिन था जब भारत के शूरवीरों ने कारगिल जंग (kargil War) जीती थी। पूरे भारत में इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे 21 साल पहले हुए कारगिल युद्ध को यादकर ब्रिगेडियर कारिअप्पा की आंखे नम हो जातीं हैं। कारगिल युद्ध के दौरान बालयेदा मुथन्ना कारिअप्पा(बी एम कारिअप्पा) सेना में पांच पारा के कैप्टन थे। कैप्टन को कोनिकल पहाड़ी पर कमान संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। इनकी टीम में 23 जवान थे।

वह बताते हैं कि 23 या 24 जुलाई की रात होगी, जब दुश्मन उनकी टुकड़ी के बिल्कुल करीब आ चुका था। दुश्मनों की संख्या काफी ज्यादा थी और भारतीय जवान उनकी तुलना में काफी कम। उस वक्त दुश्मन और कैप्टन की टीम के बीच का फासला मात्र 40 मीटर रह गया था और दुश्मन आरपीजी से अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था।

कई भारतीय जवान घायल हो चुके थे। कैप्टन ने मदद के लिए रेडियो सेट पर बोफोर्स के लिए आर्टिलरी अफसर से बात की, पर अफसर ने उन्हें मना कर दिया।

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अपने से ज्यादा की संख्या में दुश्मनों से लड़ते रहने के लिए पर्याप्त हथियार भी नहीं थे। टीम के सभी सैनिकों को नहीं पता था कि अब क्या होगा,पर उन्हें अपने कैप्टन पर पूरा भरोसा था। कैप्टन पूरी टीम को बचाने और दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए रॉकेट लॉन्चर दाग रहे थे। वह अपने जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए एक सेंगर से दूसरे सेंगर जा रहे थे। तभी तकरीबन 100 दुश्मनों ने एक साथ टीम पर हमला कर दिया। एलएनजी (लाइट मशीन गन) पर बैठे जवान को भी गोली लग गई। तभी टीम का एक सैनिक जिसका नाम युद्धवीर था, ने एलएनजी संभाली और कई दुश्मनों को मार गिराया। इस बीच युद्धवीर के एक हाथ में गोली लग गई, फिर भी उसने हार नहीं मानी और गोली चलता रहा।

दुश्मनों की तरफ से लगातार आते गोले से कुछ छर्रे कैप्टन के सिर और गले पर लग गए। सभी ने मिलकर छर्रे निकाले और उनकी पट्टी की। बोफोर्स मदद के लिए आगे आया और उसने गोले दागने शुरू किए।

सभी जवान पहाड़ियों के पीछे सर नीचे की ओर कर के छुप गए। बोफोर्स लगातार दुश्मनों पर गोले बरसा रहा था। जब बोफोर्स ने गोले दागने बंद किए और सिर ऊपर किया तो चारो तरफ खून और मांस के लोथड़े दिखाई दे रहे थे। सब एक दूसरे को देखकर खुश हो रहे थे, एक दूसरे को गले लगा रहे थे क्योंकि सब जिंदा थे।

कैप्टन की सूझ बूझ और साहस से दुश्मनों के दांत खट्टे करने और और बिना किसी नुकसान के टारगेट हासिल करने के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। टीम के सैनिकों का मानना था कि कैप्टन कारिअप्पा के बिना कोनिकल की पहाड़ी पर विजय पान असंभव था। कैप्टन अब ब्रिगेडियर हो गए हैं, बीते दिनों को याद कर वह भावुक हो जाते हैं।

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