आग में चलकर और बिना सहारे पहाड़ पर चढ़कर बनते हैं ‘गरुड़ कमांडो’, पढ़िए ट्रेनिंग से जुड़ी हर बात

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जम्मू-कश्मीर में 2001 में एयर बेस पर आतंकी हमले के बाद वायु सेना को एक खास तरह फोर्स की जरूरत महसूस हुई, जो ऐसे हमलों को रोक सके या सफलता पूर्वक उनका सामना कर सके। इसी के बाद 2004 में एयरफोर्स ने अपने एयर बेस की सुरक्षा के लिए गरुड़ कमांडो फोर्स की स्थापना की। गरुड़ कमांडोज की ट्रेनिंग नेवी के मार्कोस और आर्मी के पैरा कमांडोज की तर्ज पर ही होती है। इन्हें एयरबॉर्न ऑपरेशंस, एयरफील्ड सीजर और काउंटर टेररेजम का जिम्मा उठाने के लिए ट्रेन्ड किया जाता है। इंडियन एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो मुश्किल हालात में न केवल जमीन, आसमान और पानी में किसी भी ऑपरेशन को बखूबी अंजाम दे सकते हैं, बल्कि दुश्मन को घर में घुस कर भी मार सकते हैं।

2003 में गरुड़ कमांडो फोर्स बनाने का फैसला लिया गया था, लेकिन 6 फरवरी, 2004 को इन्हें इंडियन एयरफोर्स में शामिल किया गया। आर्मी और नेवी से अलग, गरुड़ कमांडो वॉलंटिअर नहीं होते। उन्हें सीधे स्पेशल फोर्स की ट्रेनिंग के लिए भर्ती किया जाता है और एक बार फोर्स जॉइन करने के बाद कमांडो अपने पूरे करियर के लिए यूनिट के साथ रहते हैं। इस वजह से यूनिट के पास लंबे समय के लिए बेस्ट सोल्जर रहते हैं। गरुड़ कमांडो को लगभग ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद तैयार किया जाता है। कमांडो ट्रेनिंग में इन्हें उफनती नदियों और आग से गुजरना, बिना सहारे पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है। भारी बोझ के साथ कई किलोमीटर की दौड़ और घने जंगलों में रात गुजारनी पड़ती है। खतरनाक हथियारों से लैस इंडियन एयरफोर्स के खूंखार गरुड़ कमांडो दुश्मन को खत्म करके ही सांस लेते हैं।

शुरुआती 3 महीनों के प्रॉबेशन पीरियड के दौरान अगले दौर की ट्रेनिंग के लिए बेस्ट जवानों की छंटनी होती है। अगले फेज की ट्रेनिंग स्पेशल फ्रंटियर फोर्स, इंडियन आर्मी और नेशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स के साथ दी जाती है। जो इस फेज में सफल होते हैं, वे अगले दौर की ट्रेनिंग में जाते हैं। इतनी सख्त ट्रेनिंग में सफल रहने वाले जवानों को फिर आगरा के पैराशूट ट्रेनिंग स्कूल भेजा जाता है। मार्कोस और पैरा कमांडोज की तरह गरुण कमांडो भी सीने पर पैरा बैज लगाते हैं। गरुड़ कमांडोज को मिजोरम में काउंटर इन्सर्जन्सी ऐंड जंगल वारफेयर स्कूल (सीआईजेडब्लूएस) में भी ट्रेनिंग दी जाती है। भारतीय सेना का यह संस्थान अपारंपरिक युद्ध में विशेषज्ञता प्रदान करने वाला प्रशिक्षण संस्थान है।

इस संस्थान में न केवल गरुड़ कमांडो, बल्कि दुनियाभर की सेनाओं के सिपाही काउंटर-इन्सर्जन्सी ऑपरेशंस की ट्रेनिंग लेने आते हैं। इसके अलावा गरुड़ कमांडो को हर तरह से युद्ध के लिए तैयार करने के लिए ट्रेनिंग के अंतिम दौर में इन्हें भारतीय सेना के पैरा कमांडोज की सक्रिय यूनिट्स के साथ फर्स्ट हैंड ऑपरेशनल एक्सपीरियंस के लिए भी अटैच किया जाता है। जहां वे अन्य बारीकियों को सीखते हैं। भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडो को दुनिया की कुछ सबसे खतरनाक हथियारों से लैस किया गया है। इनके पास जहां साइड आर्म्स के तौर पर Tavor टीएआर -21 असॉल्ट राइफल होता है, वहीं ग्लॉक 17 और 19 पिस्टल भी दिए जाते हैं। इसके अलावा क्लोज क्वॉर्टर बैटल के लिए हेक्लर ऐंड कॉच MP5 सब मशीनगन, AKM असॉल्ट राइफल, एके-47 और शक्तिशाली कोल्ट एम-4 कार्बाइन भी इन्हें दी जाती है।

गरुड़ कमांडो के पास इजराइल में बने किलर ड्रोन्स हैं, जो टारगेट पर बिना किसी आवाज के मिसाइल फायर कर सकते हैं। मॉडर्न हथियारों से लैस गरुड़ कमांडो हवाई हमले, दुश्मन की टोह लेने, स्पेशल कॉम्बैट और रेस्क्यू ऑपरेशन्स के लिए ट्रेंड होते हैं। एयरफोर्स के कमांडो स्निपर्स से भी लैस होते हैं जो चेहरा बदलकर दुश्मन को झांसे में लाता है और फिर मौत के घाट उतार देता है। गरुड़ स्पेशल फोर्स के पास 200 UAV ड्रोन के साथ-साथ ग्रेनेड लांचर भी हैं। आतंकियों का सफाया करने के लिए गरुण कमांडो जम्मू और कश्मीर में इंडियन आर्मी के साथ कई काउंटर इन्सर्जेन्सी ऑपरेशन कर चुके हैं। शांति के समय उनकी मुख्य जिम्मेदारी होती है, वायुसेना की एयरफील्ड्स की सुरक्षा करना।

 

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