“मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है”: चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दिलेर, सबसे बहादुर और सबसे अच्छे नेतृत्व कौशल के लिए विख्यात क्रांतिकारी थे। चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस पर उनके जीवन से जुड़े हुए कुछ प्रेरणा दायक किस्से जानेंगे। आजाद किस तरह अंग्रेजी हुकूमत को देते थे चंद्रशेखर आजाद चुनौती, एक बार नहीं, बार-बार लगातार? चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे मतवाले और यशस्वी क्रांतिकारी थे। 17 साल के चंद्रशेखर क्रांतिकारी दल हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएशन में शामिल हो गए थे। दल में उनको सब क्वीक-सिल्वर कह कर पुकारते थे। मतलब, जिसका पारा बड़ी जल्दी चढ़ जाता हो। पार्टी की ओर से धन एकत्र करने के लिए जितने भी काम होते थे,चंद्रशेखर आजाद उनमें सबसे आगे रहते थे। सैंडर्स,… भगत सिंह द्वारा सेंट्रल असेंबला में बम फेंका जाना, वायसराय की ट्रेन बम से उड़ाने की कोशिश, इन सबकी जो योजना बनती थी, उसको नेतृत्व चंद्रशेखर आजाद ही दिया करते थे। प्रसिद्ध काकोरी कांड में भी आजाद ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। पंडित चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था 23 जुलाई, 1906 को भवरा में, जो अब मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में आता है। उनके पिता का नाम था पंडित सीताराम तिवारी। भीषण अकाल पड़ने के कारण वे उत्तरप्रदेश के उन्नांव जिले को छोड़, मध्यप्रदेश की अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में जाकर बस गए थे। चंद्रशेखर जब बड़े हुए, अपने माता-पिता को छोड़कर भाग गए और बनारस पहुंच गए। वहां अपने फुफा शिव विनायक मिश्र के साथ रहने लगे। वहीं उन्होंने संस्कृत विद्यापीठ में दाखिला लिया और वहीं से शुरू हुई आजादी की लड़ाई के सफर में उनकी भागीदारी।

Chandrashekhar Azad

बचपन से ही चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) के अंदर एक अजीब सी हिम्मत और जिद थी। एक किस्सा है। चंद्रशेखर आजाद एक आदिवासी गांव में रहते थे, वहीं बड़े हुए थे। सबसे निर्धन परिवार शायद मोहल्ले में उन्हीं का था। दिपावली का समय था। किसी के पास फुलझड़ी थी, किसी के पास पटाखे तो किसी के पास मेहताब की रंगीन माचिस। चंद्रशेखर के पास कुछ भी नहीं था। फिर नजर पड़ी उसकी एक बच्चे पर जिसके पास मेहताब की माचिस थी। वह उसमें से एक तिल्ली निकालता, एक छोर से उसके पकड़ कर डरते-डरते माचिस से रगड़ता और जैसे ही माचिस जलती, रंगीन रोशनी निकलनी शुरू होती, डर कर तिल्ली के जमीन पर फेंक देता। अब, बालक चंद्रशेखर से रहा नहीं गया, उसने कहा मुझे माचिस दो, मैं सारी तिल्लियां एक साथ जलाऊंगा और जब तक वह पूरी जल नहीं जाएंगी, हाथ में पकड़े खड़े रहूंगा। बालक ने बड़े चुनौतीपूर्ण अंदाज से वह माचिस चंद्रशेखर आजाद  को दी और कहा कि जो कह रहे हो, वो कर के दिखाओ तो जानूं। चंद्रशेखर ने सारी तिल्लियां इकट्ठी निकालीं माचिस से और भक्क से तिल्लियां जला दीं। जिन तिल्लियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की तरफ था, वे भी जलने लगीं और चंद्रशेखर की हथेली भी जलने लगी। असह्य जलन हुई, फफोले पड़ गए, लेकिल चंद्रशेखर ने उन तिल्लियों को तब तक नहीं छोड़ा हाथ से, जब तक कि उनकी रंगीन रोशनी समाप्त नहीं हुई।

पढ़ें: ट्रेन के डिब्बे में आग लगाने से 59 हिंदूओं की मौत

आइए अब जानते हैं उस किस्से के बारे में, जिसमें खुद ही चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद रख लिया। बात 1921 की है, महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चल रहा था। चंद्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गए। पारसी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश हुए। वह पारसी मजिस्ट्रेट जिनका नाम था मिस्टर खरे घाट, बड़ी कड़ी सजा सुनाते थे। उन्होंने चंद्रशेखर से सवाल पूछने शुरू किए। पूछा, नाम क्या है तुम्हारा? चंद्रशेखर का जवाब, मेरा नाम आजाद है। तुम्हारे पिता का क्या नाम है? मेरे पिता का नाम स्वाधीन है। घर कहां है तुम्हारा? मेरा घर जेलखाना है। मजिस्ट्रेट बालक चंद्रशेखर के उत्तरों से चिढ़ गए। उन्होंने चंद्रशेखर को 15 बेंतों की सजा सुना दी। उस समय चंद्रशेकर सिर्फ 14 साल के थे। जल्लाद ने अपनी पूरी ताकत के साथ बालक चंद्रशेखर की पीठ पर बेंतों के प्रहार किए। लेकिन पीड़ा सहने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था और फिर एक जुनून भी तो सवार था उनपर। हर बेंत के साथ वो चिल्लाते, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय। जब पूरी 15 बेंत उनपर पड़ चुकी तो जेल के नियमानुसार जेलर ने बच्चे चंद्रशेखर की हथेली पर तीन आने भी रख दिए। पर उन्होंने वह पैसे उठाकर जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल से चले गए। इस पहली अग्नि परीक्षा में जिस अंदाज में बालक चंद्रशेखर उत्तीर्ण हुए थे, उसकी वजह से बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में उनका नागरिक अभिनंदन हुआ। सब उन्हें अब चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) कह कर बुलाने लगे थे।

काकोरी डकैती कांड चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) के क्रांतिकारी जीवन का महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइंट था। इस अभियान के नेता थे रामप्रसाद बिस्मिल। उस समय चंद्रशेखर आजाद की उम्र बहुत कम थी। स्वभाव भी बड़ा चंचल था। इसलिए ही उनका नाम क्वीक-सिल्वर या पारा पड़ा था, यह रामप्रसाद बिस्मिल ने ही उन्हें दिया था। 9 अगस्त, 1925 के दिन क्रांतिकारियों ने लखनऊ के नजदीक काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर-लखनऊ सवारी गाड़ी को रोक कर उसमें रखा अंग्रेजी खजाना लूट लिया था। एक-एक कर के सभी क्रांतिकारी पकड़े गए। पर, चंद्रशेखर आजाद कभी भी पुलिस के हाथ नहीं आए। हालांकि, पास ही झांसी में वे पुलिस थाने में अक्सर जाया करते थे। पुलिस वालों से गपशप लड़ाते थे। पर पुलिस वालों को कभी उनपर संदेह नहीं हुआ कि यही शख्स महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भी हो सकता है। काकोरी कांड के बाद ही उन्होंने एक नए दल का गठन किया था। जिसका नाम रखा था, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएसन एंड आर्मी। चंद्रशेखर खुद इस नए दल के कमांडर थे। वे घूम-घूम कर गुप्त रूप से दल का कार्य बढ़ाते थे। जब झांसी में पुलिस की हलचल बढ़ने लगी तो चंद्रशेखर आजाद ओरछा राज्य में खिसक गए और वहां एक और वहां एक नदी के किनारे कुटिया बनाकर ब्रह्मचारी की तरह रहने लगे। आजाद कभी पुलिस के हाथ नहीं आए, उसका एक बड़ा कारण यह भी था कि जब भी पुलिस की सरगर्मी शहरों में बढ़ती तो आजाद शहर छोड़ गांव की ओर खिसक जाते थे और स्वयं को स्थानीय परिवेश में सम्मिलित कर लिया करते थे, उसी में शामिल हो जाया करते थे और इस तरह वे खुद को सुरक्षित रखते थे।

एक और बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है कि कैसे चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) ने अपने लिए एक जीजा जी भी ढूढ़ लिया था। हुआ ये कि जिन दिनों चंद्रशेखर आजाद झांसी में छुपकर रह रहे थे, वहां उन्होंने मोटर मेकेनिक की तरह भी काम किया, मोटर चलाना सीखा और हद तो तब हुई जब आजाद ने पुलिस सुपरिटेंडेंट की कार चलाकर उनसे ही मोटर चलाने का लाइसेंस भी हासिल कर लिया। उन्हीं दिनों मोटर कंपनी के एक ड्राइवर रामानंद ने चंद्रशेखर आजाद के रहने के लिए अपने ही मोहल्ले में एक कोठरी उन्हें किराए पर दिलवा दी। उसी मोहल्ले में जिसमें चंद्रशेखर आजाद रहते थे, एक रामदयाल नाम का ड्राइवर भी रहा करता था। जो दिन में तो बिल्कुल सही रहता था। लेकिन रात जब शराब पीकर घर आता था, तो अपनी पत्नी की बड़ी बेदर्दी से पीटाई किया करता था। लेकिन एक दिन क्या हुआ कि सुबह-सुबह कि चंद्रशेखर आजाद  कारखाने जाने के लिए अपनी कोठरी से बाहर निकले तो रामदयाल से भेंट हो गई और बात-चीत का सिलसिला भी रामदयाल ने कुछ इस तरह से छेड़ा कि आज-कल आप रात बहुत देर तक जाग कर कुछ ठोका-पीटी किया करते हो, उससे हमारी नींद हराम हो जाती है। इस पर चंद्रशेखर बोले, मैं तो कल-पुर्जों की ही ठोका-पीटी किया करता हूं, तुम तो शराब के नशे में आकर रात अपनी बीबी की इतनी पिटाई करते हो कि पूरे मोहल्ले की ही नींद हराम हो जाती है। अब रामदयाल को ये बात सख्त नागवार गुजरी, उसको बुरी तरह से गुस्सा आया। उसने कहा, तू कौन होता है मुझे रोकने वाला, मेरी बीबी है, जितना चाहूंगा, मारूंगा और रात क्या अभी लाकर मारता हूं और साथ ही साथ उन्होंने चंद्रशेखर आजाद को साला भी कह दिया। कुछ और गालियां भी दे दीं। चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) का कहना था कि जब तुमने मुझे साला कह ही दिया है। अपनी पत्नी का भाई मान ही लिया है तो मेरे सामने पत्नी की पिटाई करोगे तो फिर तुम्हारी खैरियत नहीं। बस रामदयाल को और गुस्सा आया। आग बबूला हो घर में घुसा, अपनी पत्नी की चोटी पकड़ कर घसीटता हुआ सड़क पर लाया और जैसे ही मारने के लिए हाथ उठाया, चंद्रशेखर आजाद ने उसका हाथ पकड़ा और खींचकर एक तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया। तमाचा इतना जोरदार था कि रामदयाल की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। जमीन पर सर पकड़ कर, सर थामकर वह बैठ गया। बस, उस दिन के बाद रामदयाल ने कभी अपनी पत्नी पर हाथ नहीं उठाया। कुछ दिन बाद चंद्रशेखर आजाद ने स्वयं ही पहल करते हुए, रामदयाल के साथ अपने संबंध फिर मधुर कर लिए और उस दिन से मोहल्ले में सभी लोग रामदयाल को जीजा जी के नाम से पुकारने लगे।

उन दिनों भारत में आजादी के दीवाने कुछ राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे थे और उन्हीं मांगों को जांचने परखने के लिए भारतवासियों का पक्ष सुनने के लिए अंग्रेज हुकूमत ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग की नियुक्ति की थी, जो साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता है। पूरे भारत में साइमन कमीशन का जोरदार विरोध हुआ। जगह-जगह उसे काले झंडे दिखाए गए। जब लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध किया गया तो पुलिस कर्मियों ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपत राय को उस दिन इतनी लाठियां लगीं कि वह घायल हुए, अस्पताल में भर्ती हुए और कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad), भगत सिंह और पार्टी के अन्य सदस्यों ने लाला जी पर लाठियां चलाने वाले पुलिस अधीक्षक सॉन्डर्स को मृत्यु दंड देने का फैसला लिया। 17 दिसंबर, 1928 को चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह और राजगुरू ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे पी सॉन्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरू ने चलाई जो सॉन्डर्स के मस्तक पर लगी। वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह आगे बढ़े, चार-छह गोलियां और दागकर उन्होंने सॉन्डर्स की जीवन लीला समाप्त कर दी। जब सॉन्डर्स के अंगरक्षक ने पीछा करने की कोशिश की तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर शहर में जगजगह पर्चे चिपका दिए गए कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया गया है। समूचे भारत में जैसे आनंद की लहर दौड़ गई और सभी स्थानों पर भारतीय क्रांतिकारियों के इस कदम को सराहा गया।

एक और वाकया है कि क्यों अपनी पार्टी के हेडक्वार्टर्स में लगे एक खूबसूरत कैलेंडर को फाड़कर फेंक दिया था चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) ने।

चंद्रशेखर आजाद ने जब एक दिन इलाहाबाद में जिस घर में वह रह रहे थे, देखा कि एक खूबसूरत सा कैलेंडर आकर टंग गया है कमरे में, जिसमें किसी फिल्मी हिरोइन की तस्वीर छपी हुई है तो उन्होंने फौरन उस कैलेंडर को उतारा, फाड़ा और बाहर फेंक दिया। अब कैलेंडर कमरे में लेकर आए थे खुद बड़े क्रांतिकारी सुखदेव। जब वह कमरे में वापस पहुंचे और उन्होंने देखा दिवार से कैलेंडर गायब है, तो थोड़े कसमसाए। फिर पूछा गुस्से में कि किसने हटाया ये कैलेंडर। चंद्रशेखर आजाद ने बड़े शांत स्वर में उनसे कहा, हमने हटाया है। चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि यहां ऐसी तस्वीरों का क्या काम। उन्होंने सुखदेव को समझाया कि किसी भी आकर्षण में क्रांतिकारियों के फंसने का, उलझने का मतलब है कि मुख्य ध्येय यानि देश को आजाद कराने का लक्ष्य लेकर जो वो आगे बढ़ रहे हैं, उससे ध्यान भटक सकता है। एक
किस्सा तब का है जब अंग्रेजों का दमन चक्र तेजी से चल रहा था, जनता में खासा रोष था। ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी जेलों में बंद थे। महिलाएं ही प्रदर्शन का काम संभाल रही थीं। इलाहाबाद में उन दिनों एक जिलूस निकल रहा था महिलाओं का और उनके सामने जो भी कोई पुरूष पड़ जाता था, उसपर न सिर्फ वे खासी लानत भेजती थीं, बल्कि चुनौती देती थीं कि वह देश के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। आजादी के मतवाले उनके साथी तो जेलखानों में पड़े हैं और यह पुरूष यहां शहर में आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं। इसी जुलूस के बीच अपने एक साथी के साथ चंद्रशेखर आजाद फंस गए। एक दो महिलाओं ने चंद्रशेखर आजाद के हाथ पकड़ लिए और कहने लगीं, पहनाओ इन हाथों में चुड़ियां। जाहिर था, उन्होंने चंद्रशेखर आजाद को पहचाना नहीं था। चंद्रशेखर आजाद मुस्कुराए, अपने हाथ आगे बढ़ा दिए और कहा, लो बहन, पहना दो इनमें चुड़ियां। कद्दावर शरीर के मालिक चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) के हृष्ट-पुष्ट हाथों की चौड़ी कलाईयों पर भला कौन सी चूड़ी चढ़ सकती थी।

आगे जानेंगे अस रोचक किस्से के बारे में जब एक लड़की को चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) से प्रेम हो गया। एक बार चंद्रशेखर आजाद ने ठान ली कि पिस्तौल-बंदूक तो चलाना उन्हें आता ही है, अब चाकू चलाने की कला में भी वह माहिर होना चाहेंगे। बस, एक उस्ताद पकड़ लिया उन्होंने और सीखना शुरू किया चाकू चलाना उससे। रोज शाम उस्ताद जी के घर जाते, उनकी छत पर चाकू चलाने की प्रैक्टिस किया करते। पास ही एक दूसरे मकान की छत भी थी, जो उस्ताद जी के मकान से थोड़ा ऊंची थी। अब, जब चंद्रसाखर आजाद अपने उस्ताद जी से चाकूबाजी सीखते उसी वक्त पड़ोस की छत पर एक युवती और उसका छोटा भाई भी आकर बैठ जाते, इस चाकूबाजी की ट्रेनिंग को देखने के लिए। एक दिन कुछ ऐसा संयोग हुआ कि सीखते-सीखते चंद्रशेखर आजाद की एकाग्रता में थोड़ी सी खलल पड़ी कि उस्ताद जी को चाकू उनकी शरीर को छीलता हुआ निकल गया। उस्ताद जी के शागिर्द भी नीचे से दौड़े-दौड़े आए। लेकिन तभी देखते क्या हैं कि पड़ोस की छत से एक के बाद एक चीजें, कभी कोई कागज का टुकड़ा तो कभी कुछ और उस छत पर बरसना शुरू हो गईं जहां उस्ताद जी बैठै थे। उस लड़की के हाथों में जो भी आ रहा था, वह निशाना साध कर उस्ताद जी के उपर फेंक रही थी और उस युवती को छोटा भाई भी अपनी बहन की सहायता कर उस्ताद जी पर पड़ोस की छत से हमला बोले हुए था। उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि, लगता है लड़की का दिल आ गया है आप पर।

चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) जो कभी अंग्रेज पुलिस के हाथों गिरफ्तार नहीं हुए थे। उन्होंने एक बार एक महिला से स्वयं पेशकश की  कि वह चाहें तो चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार करवा दें। बात उन दिनों की है, जब फिरंगी पुलिस से बचने के लिए शरण लेने हेतु चंद्रशेखर आजाद एक तूफानी रात को एक घर पहुंचे, जहां एक विधवा अपनी एक बेटी के साथ रहा करता थी। हट्ठे-कट्ठे आजाद को डाकू समझ पहले तो उस वृद्धा ने शरण देने से इंकार कर दिया। लेकिन जब आजाद ने अपना पूरा परिचय दिया तो उन्हें ससम्मान उस घर में शरण दी गई। बात-चीत से चंद्रशेखर आजाद को यह जानकारी मिली कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आजाद ने उस वृद्ध महिला से कहा कि मां जी मेरे सर पर 5 हजार रूपए का ईनाम है। आप चाहें तो फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ्तारी पर 5 हजार रूपए का ईनाम पा सकती हैं। जिससे आपकी बेटी की शादी बड़े धूम-धाम से संपन्न हो जाएगी। यह सुनकर वह गरीब विधवा रो पड़ी और बोलीं कि भैया, तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती।

अब फरवरी, 1931 के उस दिन की कहानी, जब चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) को एल्फ्रेड-पार्क इलाहाबाद में घेर लिया सिपाहियों की एक पलटन ने। वाकया यह है कि एक दिन किसी मुखबिर ने पुलिस को यह सूचना दे दी कि चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। 27 फरवरी, 1931 का दिन था वह। चंद्रशेखर आजाद अपने एक साथी सुखदेव राज के साथ वहां बैठ विचार-विमर्श कर रहे थे कि मुखबिर की सूचना पर पुलिस सुपरिटेंडेंट नाट-बाबर ने आजाद को इलाहाबाद के एल्फ्रोड पारेक में घेर लिया। पुलिस द्वारा पहली गोली चलाई गई जो चंद्रशेखर आजाद की जांघ में जा लगी। आजाद किसी तरह घिसटते हुए एक जामुन के वृक्ष की ओट में पहुंचे और यही से उन्होंने पुलिस सुपरिटेंडेंट के उपर गोली चलाई। आजाद का निशाना सही लगा और गोली ने पुलिस एसपी की कलाई तोड़ दी। बहुत देर तक चंद्रशेखर आजाद ने जमकर अकेले ही मुकाबला किया फिरंगी पलटन का। उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को पहले ही वहां से भगा दिया था। आखिर में जब उनकी पिस्तौल में सिर्फ एक गोली बची तो चंद्रशेखर आजाद ने सोचा कि अगर यह गोली भी उन्होंने चला दी तो वह जीवित गिरफ्तार हो जाएंगे। बस, अब उन्होंने पिस्तौल अपनी कनपटी पर रखी और आखिरी गोली खुद पर ही चला ली। गोली घातक सिद्ध हुई और चंद्रशेखर आजाद का प्राणांत हो गया।

जब चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) की शहादत की खबर इलाहाबाद में फैली तो पूरे शहर में रोष और क्षोभ की जैसे एक लहर सी फैल गई। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने का समाचार पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को सबसे पहले मिला। उन्होंने ही कांग्रेसी नेताओं और देशभक्तों को यह समाचार बताया। शमशान घाट से आजाद की अस्थियों के साथ एक जुलूस निकाला गया। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें उस दिन इस तरह से जाम हो गईं, यातायात ऐसा अवरूद्ध हो गया, जैसे पूरा देश ही अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा हो। जुलूस के बाद एक जनसभा हुई, जिसे सचींद्रनाथ सान्याल की पत्नी ने संबोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रख कर सम्मानित किया वैसा ही सम्मान चंद्रशेखर आजाद को भी मिलेगा। सभा को जवाहर लाल नेहरू जी ने भी संबोधित किया। महात्मा गांधी का बयान था कि ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here