इस लेडी आईपीएस के नाम से ही कांप जाती है दहशतगर्दों की रूह

संजुक्ता पराशर… ये नाम दहशतगर्दों की नींद हराम करने के लिए काफी है। असम की आयरन लेडी के नाम से मशहूर आईपीएस अधिकारी संजुक्ता की बहादुरी की जितनी तारीफ की जाए कम है।

IPS संजुक्ता Sajunkta Parashar

असम की आयरन लेडी के नाम से मशहूर आईपीएस अधिकारी संजुक्ता (IPS Sajunkta Parashar) की बहादुरी की जितनी तारीफ की जाए कम है।

संजुक्ता पराशर… ये नाम दहशतगर्दों की नींद हराम करने के लिए काफी है। असम की आयरन लेडी के नाम से मशहूर आईपीएस अधिकारी संजुक्ता (IPS Sajunkta Parashar) की बहादुरी की जितनी तारीफ की जाए कम है। इन्होंने देश के पूर्वी राज्य असम में पिछले कई सालों से उग्रवादियों के खिलाफ मोर्चा संभाल रखा है। महज 15 महीने में 64 से ज्यादा आतंकवादियों को गिरफ्तार कर इस IPS ऑफिसर ने पूरे देश के सामने बहादुरी का एक नया उदाहरण पेश किया है।

बचपन से ही संजुक्ता को खेल-कूद में बेहद दिलचस्पी थी। इसके लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। असम में अपनी शुरूआती पढ़ाई करने के बाद इन्होंने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से ग्रैजुएशन किया और फिर जेएनयू से पीएचडी की। बचपन से ही इनका ख्वाब था कि आईपीएस अधिकारी बन कर देश की सेवा करनी है। लिहाजा, यूपीएससी की परीक्षा में पूरे देश भर में 85वां स्थान हासिल कर आईपीएस बनने की ललक को पूरा करते हुए संजुक्ता पराशर 2006 बैच की आईपीएस अधिकारी बनीं।

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संजुक्ता (IPS Sajunkta Parashar) अपने स्कूली के दिनों से ही अपने सूबे में आतंवादियों व भ्रष्टाचारियों के कहर से बेहद चिंतित थीं, इसलिए उन्होंने अच्छी रैंक लाने के बावजूद भी असम में ही काम कर अपने राज्य की तस्वीर सुधारने का फैसला किया। संजुक्ता की 2008 में पहली पोस्टिंग माकुम में असिस्टेंट कमान्डेंट के तौर पर हुई, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद उन्हें उदालगिरी में हुई बोडो और बांग्लादेशियों के बीच की जातीय हिंसा को काबू करने के लिए ट्रान्सफर कर दिया गया। अपने ऑपरेशन के महज़ 15 महीने में ही इन्होंने 16 आतंकियों को मार गिराया और 64 से ज्यादा आतंकियों को अपनी हिरासत में ले लिया।

संजुक्ता पराशर

संजुक्ता पराशर (IPS Sajunkta Parashar) 5 साल के एक बच्चे की मां हैं। बावजूद इसके, इनका ज्यादातर वक्त समाज सेवा और दहशतगर्दों के खिलाफ जंग में ही गुजरता। ड्यूटी से बचा हुआ वक्त रिलीफ कैंपों में गुजारने वाली संयुक्त बमुश्किल दो महीने में एक या दो दिन ही अपने पति और परिवार के साथ गुजार पाती हैं। इनकी बहादुरी और जांबाजी के किस्से अब आम हो चले हैं। आलम ये है कि दहशगर्द इनका नाम सुन कर ही भाग खड़े होते हैं। संजुक्ता की बहादुरी और कर्तव्य निष्ठा को हमारा सलाम।

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