हस्तक्षेप एपिसोड नंबर 7: गणतंत्र के तौर पर मजबूत हुआ भारत

India China Clashes

बीबीसी के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव का भारत-चीन के मौजूदा हालात पर बेबाक राय। India China Border Tension

हस्तक्षेप एपिसोड नंबर 7:- गणतंत्र देश के तौर पर मजबूत हुआ भारत (India), लेकिन मौजूदा सरकार को अपने देशवासियों से संवाद करना चाहिए और उनकी मांगों को सुनना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में अलग-अलग विचारधारा का समान सम्मान है और यहां केंद्र और राज्य में अलग-अलग विचारधारा की सरकारें इस बात को पुख्ता करती हैं कि ये देश अभी भी लोकतंत्र के स्तंभ पर ही निर्भर है। ऐसे में अपने आलोचकों की बातों को सुनकर उन्हें भी अपनी नीतियों को स्पष्ट करने से सरकार के पास उनका मुंह बंद करने का अधिकार रहेगा।

देश 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इस मौके पर भारत (India) फिर से दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र देश के रूप में अपनी पहचान बनाये हुए हैं। 23 जनवरी को दिल्ली में भारत के पहले मुख्य चुनाव आयोग के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस मौके पर देश के पूर्व राष्ट्रपति और दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे प्रणव मुर्खजी भी मौजूद थे। इस खास मौके पर प्रणव मुखर्जी ने भारत के आजाद होने के बाद दुनिया के तमाम देश, दार्शनिक और चिंतक इस बात से परेशान थे कि भारत (India) आजाद तो हो गया है लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या और समुदाय को लेकर एक लोकतांत्रिक देश के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर पायेगा। लेकिन भारत के गणतंत्रता के 70 साल बीतने के बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हम खुद को काफी हर्षित, प्रसन्नचित और गौरवान्वित महसूस करते हैं। कि ना सिर्फ हमने संघर्ष किया बल्कि एक जीवंत, ज्वलंत और सक्रिय लोकतंत्र रहे हैं। जहां अलग-अलग विचारधारा की सरकारें केंद्र और राज्यों में लगातार आती जाती रही हैं। लोगों के मौलिक अधिकारों का हमेशा सम्मान किया गया है।

हमारे देश भारत (India) में जो लोग ये आलोचना करते हैं कि यहां एक अघोषित सा आपातकाल है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, ये तुलनात्मक बातें उनकी अपनी विचारधारा से प्रेरित है।  हम एक बिल्कुल मजबूत और आजाद लोकतंत्र हैं और हमेशा ऐसे ही रहेंगे।

आज लोकतंत्र के इस मौके पर हमें जिन बातों पर सचेत रहना चाहिए, उसमें सबसे पहले हमें शाहिन बाग और देश के अन्य जगहों पर चल रहे सरकार के खिलाफ आंदोलन के पीछे भले ही किसी खास दल-विचारधारा के लोगों का हाथ हो, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीतने के बाद कहा था कि मैं सिर्फ उन लोगों का पीएम नहीं हूं जिन्होंने मुझे वोट दिया है बल्कि मैं उनका भी पीएम हूं जो मुझे पसंद नहीं करते। ऐसी स्थिति में पिछले कई दिनों से सरकार के खिलाफ जारी आंदोलन की वजह जानने के लिए सरकार के लोगों ने क्यों नहीं इन तक पहुंचने और इनकी समस्या को समझने की कोशिश की। बल्कि आपके दल के नेता और मंत्री प्रेस विज्ञप्तियों और जनसभाओं के माध्यम से इन आंदोलनों का जिक्र कर रहे हैं। इससे बेहतर होता कि खुद आंदोलनकारियों के बीच जाकर उनसे मिलते और उनसे बात करते हैं। इससे ये मांग खत्म हो जाती कि सरकार का कोई नुमाइंदा हमसे बात नहीं कर रहा और दूसरा अगर बातचीत के बाद भी ये आंदोलन खत्म नहीं होता तो सरकार के पास ये कहने का अधिकार होता कि देखिये ये कोई जन-आंदोलन नहीं है बल्कि इसके पीछे सरकार के विरोधी दलों की चाल है। इससे विपक्ष की रणनीति भी एक्सपोज करने में मदद मिलेगी। क्योंकि आपके देश की जनता का सामना तो आपको ही करना है। क्योंकि ये आंदोलनकारी भी जानते हैं कि मौजूदा सरकार अपने फैसले को वापस नहीं लेती लेकिन अगर सरकार में से कोई इनसे संवाद करेगा तो इनके पास भी सम्मानजनक तरीके से अपने आंदोलन को खत्म करने का एक कारण मिल जाएगा।

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