सवा करोड़ के ईनामी नक्सली कपल सुधाकरण और नीलिमा ने डाले हथियार, नक्सलियों को बड़ा झटका

surrendered naxal sudhakaran

किसी दौर में माओवादी संगठन की रीढ़ की हड्डी रहे सुधाकरण ऊर्फ सुधाकरन्ना और उसकी पत्नी नीलिमा रेड्डी ने तेलंगाना पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया है। सुधाकरण का आत्मसमर्पण तेलंगाना और झारखंड पुलिस के लिए भी बहुत बड़ी कामयाबी है। सुधाकरण प्रतिबंधित माओवादी संगठन सीपीआई के सभी फैसले लेने वाली पोलित ब्यूरो सेंट्रल कमेटी का मुख्य सदस्य रहा है। सरकार की ओर से उस पर एक करोड़ 35 लाख का ईनाम रखा गया था। संगठन में सुधाकरण को सुधाकर, ओगू सतवाजी, बुरयार और किरण सहित कई नामों से जाना जाता है। उसकी पत्नी के सिर भी 25 लाख का ईनाम था। नीलिमा के भी गिरोह में बैदुगुला, अरुणा, जया, पद्मा और माधव जैसे कई नाम हैं। नीलिमा स्टेट कमिटी की मेंबर रही है जिसमें झारखंड और छत्तीसगढ़ के कोर एरिया आते हैं। सुधाकरण तेलंगाना के अदिलाबाद का है और नीलिमा वारांगल की रहने वाली है।

नक्सल विचारधारा से प्रभावित होकर 1984 में नक्सल-गिरोह में शामिल होने वाला सुधाकरण बहुत ही तेज-तर्रार और शातिर था। नक्सली गतिविधियों को अंजाम देकर फरार होने में वह माहिर था। जिसकी वजह से वह संगठन के आकाओं की नजर में जल्दी ही आ गया था। साल 2000 आते-आते उसने छत्तीसगढ़ स्टेट कमिटी में अपनी जगह बना ली। तब नक्सलियों का तांडव चरम पर था। कई माओवादी गुट एक साथ आ गए थे और साथ मिलकर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र में आतंक मचा रहे थे। इन सब में छत्तीसगढ़ सबसे अधिक त्रस्त राज्य था। दंडकारण्य जोनल कमिटी जो नक्सलियों की सबसे पॉवरफुल यूनिट मानी जाती है, वह छत्तीसगढ़ में ही है। सुधाकरण वहां करीब 15 साल तक रहा। 2010 में 73 सीआरपीएफ जवानों की हत्या और उसके बाद कांग्रेसी नेताओं पर कातिलाना हमले जैसी वारदातों की प्लानिंग सुधाकरण ने ही की थी।

सुधाकरण लेवी भी वसूलता था। ऐसा कहा जाता है कि उसने करीब 20 करोड़ रूपए तेलंगाना पहुंचाए हैं। 2017 में सुधाकरण के भाई और उसके सहयोगी को लेवी के पैसे और सोना तेलंगाना ले जाते हुए झारखंड पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। यह केस बाद में एनआईए को सौंप दिया गया था। जिसमें एनआईए ने सुधाकरण और नीलिमा को फरार घोषित कर दिया था। सुधाकरण और नीलिमा को पकड़ने के लिए झारखंड पुलिस ने कई बार अभियान चलाया। लेकिन वे दोनों पुलिस की गिरफ्त से बचते रहे।

उधर, 2014 आते-आते एंटी-माओ ऑपरेशंस बढ़ने लगे और नक्सलियों के गढ़ झारखंड से उनका सफाया होने लगा। गिरोह के आकाओं को अपनी शाख बचाने की चिंता सताने लगी। तब उन्हें दंडकारण्य में सक्रिय सुधाकरण की याद आई। झारखंड में संगठन को बचाने के लिए सुधाकरण को बिहार-झारखंड स्पेशल कमिटी की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी गई। साथ ही उसे सीपीआई पोलित ब्यूरो सेंट्रल कमिटी का मेंबर भी बना दिया गया।

शीर्ष नक्सली अरविंद जी की मौत के बाद सुधाकरण ने झारखंड में लातेहार, सिमडेगा, लोहरदगा, गुमला और गढ़वा जिले से घिरे बूढ़ा पहाड़ को अपना ठिकाना बना लिया। यहां उसने स्थानीय युवाओं को नक्सल विचारधारा की पट्टी पढ़ाने और उन्हें संगठित करने का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इन इलाकों में उसका आतंक इतना बढ़ गया कि पुलिस ने गृह विभाग के आदेश पर बूढ़ा पहाड़ के 29  हार्डकोर नक्सलियों पर एक करोड़ तक का इनाम रख दिया। उसकी पत्नी नीलिमा भी छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों ही जगह अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रही थी।

पर 2015 तक बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों के नक्सल विरोधी अभियान काफी तेज हो गए। सुधाकरन की उम्र बढ़ रही थी और कई बीमारियों ने भी उसे जकड़ लिया था। नीलिमा को भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने लगीं। ऐसी हालत में उन्हें संगठन का सपोर्ट मिलना बंद हो गया। साथ ही संगठन में नए लोग भी आने लगे, जो नक्सल विचारधारा को बढ़ावा देने की जगह सिर्फ लूटपाट, खून-खराबा और आतंक को बढ़ावा देने लगे। सुधाकरण के लिए नक्सली विचारधारा भी महत्वपूर्ण थी। ये बातें ही उसके संगठन से नाता तोड़ने की वजह हैं।

सुधाकरण पर तीन दर्जन से भी अधिक मुकदमे हैं। पर पश्चिम-बंगाल, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के सेरेंडर पॉलिसी के मुताबिक न तो वे दोनों जेल जाएंगे और न ही उन्हें रिमांड पर लिया जाएगा। साथ ही सरेंडर पॉलिसी के अनुसार उन पर लगे सारे आरोप भी हटा लिए जाएंगे।

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