जिस खाकी वर्दी को देख कर उठा लेता था हथियार, आज उसी वर्दी को सिल कर करता है गुजारा

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जुल्म और शोषण के खिलाफ जिस क्रांति के नाम पर लोगों ने हथियार उठाए थे, उसका असली चेहरा सामने आने पर उन्हें घुटन महसूस होने लगती है। उन्हें लगता है कि वे भटक गए हैं, गलत रास्ते पर चल पड़े हैं और फिर शुरू होती है उनके घर वापसी की कहानी। ऐसी ही एक कहानी है सालों पहले रास्ता भटके राम पदों लोहरा की। वह मजलूमों पर जमींदारों के जुल्म और शोषण के खिलाफ बागी हुआ, हथियार उठाया और जंगल को अपना ठिकाना बनाया। पर धीरे-धीरे उसे इसकी असलियत का पता चला, तो सरेंडर करके मुख्यधारा में लौटा आया।

राम पदों लोहरा झारखण्ड के नक्सल प्रभावित इलाके तमाड़ के पुण्डीदीरी गांव के रहने वाले हैं। गांव के जमींदार सत्य नारायण मुंडा ने इनके पिता की मज़बूरी का फायदा उठा कर उनसे उनकी जमीन हड़प ली। बचपन तंगी में गुजारने के बाद जब बड़े हुए तो इन्होंने अपनी जमीन वापस पाने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ने की ठानी। पैसे कमाने के लिए उसने कपड़े सिलने का काम शुरू किया जिससे वह कोर्ट की लड़ाई लड़ सकें। यह बात उनके इलाके में सक्रिय नक्सली कमांडर सुजीत को पता चली। सुजीत ने अपने दस्ते के कपड़े राम से सिलवाना शुरू किया। राम पदों को इस मेहरबानी की वजह जब तक समझ आती तब तक पुलिस रिकॉर्ड में उनका नाम नक्सली समर्थक के रूप में दर्ज हो चुका था।

इस बात का पता उसे तब चला जब पहली बार पुलिस उसके घर पहुंची। और फिर तो पुलिस वालों का रोज का आना हो गया। राम पदों का गांव में रहना दुश्वार हो गया था। इस बात से परेशान होकर वह जा पहुंचा सुजीत की शरण में। वह अब नक्सली दस्ते में शामिल हो चुका था। यह साल 2005 की बात है, जिसे याद कर वह आज भी सिहर उठते हैं। पुलिस उसे उसके गांव में ढूंढ रही थी और वह बियाबान में हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था। राम पदों संगठन में इतना व्यस्त हो गया कि उसे गांव में रह रही अपनी पत्नी और 3 बच्चों का भी ख्याल नहीं आया।

कुछ समय बाद सुजीत के दस्ते का सेकेंड इन कमांड कुख्यात नक्सली कुंदन का प्रमोशन हुआ और वह दल का मुखिया बन गया। बढ़े हुए कद, लड़कियों की बुरी लत और पैसों की भूख ने कुंदन को खूंखार बना दिया था। वह गांव वालों पर तो अत्याचार करता ही था, दल के सदस्यों पर भी उसने जुल्म करना शुरू कर दिया था। उसके शोषण से गांव वाले ही नहीं दस्ते के लोग भी परेशान हो गए थे। राम पदों और दल के अन्य सदस्यों को एहसास होने लगा कि जो भी हो रहा है वह सही नहीं है। वे संगठन छोड़ने का मन बना ही रहे थे कि अचानक एक रात दस्ते की मुठभेड़ पुलिस से हो गई। उस दिन मौत को बहुत करीब से देखा था राम पदों ने। ऐसे में उसे अपने परिवार का ख्याल आया। पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ और कुंदन के जुल्मों ने उसकी सोच बदल दी। उस दिन वह तो बच गया मगर उसके अंदर का नक्सली मर चुका था।

लोहरा ने अपने साथियों के जरिए रांची पुलिस के तत्कालीन एसएसपी साकेत कुमार सिंह और ग्रामीण एसपी सुरेंद्र झा से संपर्क किया और 2013 में उसने हथियार डाल दिया। आज राम पदों लोहरा रांची पुलिस लाइन में पुलिस की वर्दी सिलते हैं। वह वही वर्दी सिलते हैं जिसे कभी खून से सना देखना उनकी फितरत थी। राम पदों को इस बात का अफ़सोस है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के 11 साल बर्बाद कर दिए। 8 साल जंगल में और तीन साल जेल में। इस दौरान उनके बच्चों का भविष्य अंधकार में चला गया। मगर अब उन्हें उम्मीद है कि इस नई ज़िंदगी में वे अपने बच्चों के अच्छे कल की बुनियाद रख सकेंगे।

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