सिरिसा का भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम तक का सफर

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प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को विश्व-महिला दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं के अधिकारों की बातें होती हैं। महिला सशक्तीकरण की बातें होती हैं, समाज में महिलाओं की भागीदारी की बात होती है। तमाम तरह की बेड़ियों को तोड़कर दुनिया जीतने वाली महिलाओं को याद किया जाता है। उस आधी आबादी पर चर्चा होती है जो अपने हुनर और क़ाबिलियत की बदौलत इस दुनिया के लिए कुछ कर गुज़रती हैं।

महिला दिवस के मौक़े पर ऐसी ही कुछ महिलाओं की कहानियां हम आपसे साझा कर रहे हैं। जिन्होंने हिंसाग्रस्त क्षेत्र और परिवेश में रहते हुए कुछ अलग करके दिखाया। ओडिशा में माओवादियों का गढ़ मने जाने वाले मालकानगिरी ज़िले की रहने वाली सिरिसा करामी ने कुछ वर्ष पूर्व भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम में स्थान हासिल किया।

दो साल पहले केरल के एर्नाकुलम में हुए सेलेक्शन ट्रायल्स में सिरिसा ने अपनी क़ाबिलियत से चयनकर्ताओं को इतना प्रभावित किया कि सेलेक्शन कमेटी ने सिरिसा को भारतीय टीम में शामिल कर लिया था। सिरिसा ने अपनी हुनर के ज़रिए पहले जिला और राज्य स्तर पर अपना वॉलीबॉल के जौहर दिखाया और फिर केरल में ओडिशा का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय दल में स्थान भी पा लिया।

कालीमेला के कन्याश्रम से भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम तक का सिरिसा का सफर आसान नहीं था। इस राह में सैकड़ों मुश्किलें आईं। सिरिसा की मां सेलम्मा करामी कन्याश्रम में रसोई का काम करतीं हैं। परिवार आर्थिक तंगी के दौर से गुज़रा। सिरिसा की मां सेलम्मा पूर्व में माओवादी संगठन से जुड़ी थीं। पर उन्होंने 1994 में इस हिंसक संगठन को अलविदा कह दिया था। संगठन छोड़ने के बाद इन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सिरिसा की मां सेलम्मा को कालीमेला कन्याश्रम में रसोइया की नौकरी मिली। पर इस नौकरी से घर परिवार का गुज़ारा होना बहुत मुश्किल था। रसोईया की नौकरी के साथ-साथ इनकी मां मज़दूरी का काम भी करती हैं और जंगलों में जाकर कुछ जंगलों की चीज़ें लातीं हैं, जिन्हें बेचकर कुछ पैसे मिल जाते हैं।

सिरिसा को अपनी मां पर फ़ख़्र है क्योंकि जिस मुश्किल से मां ने सिरिसा और उसकी बहन को बड़ा किया है वह वाक़ई एक संघर्षपूर्ण सफ़र था और इस सफ़र में बेटियों ने मां का पूरा साथ दिया। सिरिसा की कहानी इस लिए अलग है क्योंकि सिरिसा का परिवार पूर्व में माओवादी संगठन से जुड़ा था। सिरिसा ऐसे क्षेत्र से थीं जहां कोई उम्मीद नहीं कर सकता कि यहां की कोई बेटी आगे चलकर देश का नाम रोशन करेगी।

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ऐसी ही एक और कहानी है नक्सलवाद का गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के दोरनापाल की। जहां की रहने वाली बेटी माया ने क्षेत्र की पहली एमबीबीएस डॉक्टर बनकर इतिहास रचा था। माया ने तमाम परेशानियों का सामना करने के बावजूद डॉक्टर बनकर पूरे क्षेत्र में लड़कियों के लिए एक उम्मीद जगाई। जो जगह हिंसा के लिए जानी जाती थी, वहां बाप का साया न होने के बाद भी माया ने मेहनत और लगन से डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। दस साल की उम्र में अपनी पिता को खो देनी वाली इस लड़की ने ना सिर्फ़ अपने सपने को पूरा किया बल्कि लोगों तक ये संदेश देने में कामियाब रही कि अगर कुछ कर गुज़रने की चाहत है तो उसे कोई रोक नहीं सकता।

आर्थिक तंगी से भी गुजरने के बावजूद भी माया के हौसले नहीं डगमगाए। तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करते हुए माया ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। माया की ये उपलब्धि उन तमाम लोगों के लिए एक सबक है जो तंगी और परेशानी के कारण सच्चाई का रास्ता छोड़कर हिंसा की तरफ चल पड़ते हैं।

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