आदिवासियों के हालात बदलने की एक कवायद ये भी

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हालात बदलने के लिए दृढ़ इच्छा-शक्ति की जरूरत होती है, फिर रास्ते तो अपने आप ही बनते चले जाते हैं। बदलाव के लिए ऐसा ही एक रास्ता निकाला है इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) की 41वीं बटालियन के जवानों ने। नक्सल-प्रभावित छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के हडेली में आईटीबीपी (ITBP) कैंप के जवान स्कूल के बच्चों से वहां की स्थानीय बोली सीख रहे हैं और बदले में शिक्षक बन उन्हें पढ़ा रहे हैं।

दरअसल, कोंडागांव जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर मर्दापाल का वनांचल ग्राम हड़ेली नारायणपुर नक्सल-ग्रस्त इलाका है। वहां तैनात जवानों को भाषा की वजह से लोगों से बातचीत करने में परेशानी होती थी। एक तो वैसे ही गांव के लोग जवानों को देखकर डर जाते थे, उपर से एक-दूसरे की बात नहीं समझ पाने से जवानों और स्थानीय लोगों के बीच ठीक से संवाद नहीं हो पाता था। भरोसा जीतने के लिए आपस में बातचीत जरूरी होती है। गांव को नक्सल-मुक्त कर वहां शांति बहाल करने का जवानों का मकसद बिना गांव वालों के सहयोग के संभव नहीं था। वहां की बोली हल्बी है और जवानों को यह बोली बिल्कुल नहीं आती थी, जिससे उन्हें बहुत परेशानी होती थी। उन्होंने प्रशासन से भी इस भाषा के प्रशिक्षण की मांग की, पर कुछ खास नहीं हो पाया। तो जवानों ने इस समस्या का समाधान खुद ही निकाल लिया।

गांव के मिडिल स्कूल में शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाती थी। जवानों को ख्याल आया कि क्यों न इन्हीं बच्चों से हल्बी सीखी जाए और बदले में उन्हें पढ़ाया जाए। इस तरह से उनकी पढ़ाई में मदद हो जाएगी। साथ ही उनकी बोली भी सीखी जा सकती है और बच्चों और गांव वालों के साथ घुला-मिला भी जा सकता है। इसके लिए शिक्षा विभाग के अफसरों से बात की गई। उनकी मंजूरी मिलने के बाद जवानों को स्कूल भेजना शुरू किया गया।

पेट्रोलिंग से लौटने के बाद जवान स्कूल पहुंच जाते। स्कूल के समय में वे बच्चों को गणित, विज्ञान आदि विषय पढ़ाते और स्कूल खत्म होने के बाद बच्चे उन्हें हल्बी सीखाते। इस तरह धीरे-धीरे बच्चों और जवानों में दोस्ती होने लगी। उनपर गांववालों का भरोसा भी बढ़ने लगा, जवान उन्हें अपने लगने लगे। अब तो गांव वाले अपनी समस्याएं लेकर प्रशासन के पास जाने की बजाय जवानों के पास ही आते हैं। बीमार होने पर कैंप में ही इलाज कराते हैं। सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत ग्रामीणों को जरूरत का सामान भी बांटा जाता है।

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जवान अब बच्चों को अलग-अलग खेल भी सिखा रहे हैं। इसके अलावा जवान हॉकी और तीरंदाजी कैंप लगाकर बच्चों को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। बच्चों को डर न लगे इसलिए जवान अपने हथियार स्कूल के बाहर रखकर जाते हैं। हालांकि यहां नक्सलियों का खतरा रहता है। फिर भी जवान अपने हथियार बाहर ही रखते हैं ताकि बच्चे डरें न। ऐसे में जवानों और बच्चों की सुरक्षा के लिए बाहर माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल के साथ आईटीबीपी (ITBP) के जवान खड़े रहते हैं।

स्कूल में बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी है। सभी बच्चे रोज स्कूल आते हैं। यदि कोई बच्चा स्कूल नहीं पहुंचता तो जवान उसके घर जाकर पता करते हैं। कोई बच्चा बीमार पड़ा तो उसे कैंप ले जाकर इलाज भी कराते हैं। गांव के लोग कहते हैं कि अब बच्चों को स्कूल भेजना नहीं पड़ता, वे खुद स्कूल जाने के लिए तैयार रहते हैं। स्कूल के प्राचार्य बंशीलाल कश्यप बताते हैं कि नक्सल क्षेत्र के बच्चे भटक न जाएं, इसके लिए बच्चों को पढ़ाकर जवान उन्हें सही रास्ता दिखा रहे हैं। स्कूल में पर्याप्त शिक्षक भी नहीं हैं, इसलिए जवानों की इस पहल से बच्चों की शिक्षा में बहुत मदद मिल रही है।

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