शोषण, बगावत, इश्क, अदावत… एकदम फिल्मी है इस खूंखार नक्सली की कहानी

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नक्सल कमांडर रहे बलबीर महतो की कहानी किसी फ़िल्म से कम नहीं है। पहले घरेलू विवाद के चलते घर छोड़ कर मुंबई भागा। वहां जिल्लत और मार-पीट से तंग आकर घर लौटा। फिर हथियार उठाकर करीब डेढ़ दशक तक जंगल में आतंक फैलाता रहा। जंगल में भी उसे वैसी ही जिल्लत झेलने को मिली, जिसके चलते कभी उसने हथियार उठाया था।

झारखंड के नवाडीह निवासी बलबीर ने 2005 में नक्सल संगठन की सदस्यता ली। शुरुआत में बिहार के झाझा चक्रधरपुर क्षेत्र के प्रभारी अनुज दा के अंडर काम किया। इसके बाद जमुई के एरिया कमांडर प्रकाश यादव के दस्ते में रहा। इसी बीच 2006 में वह प्रशासन के हत्थे चढ़ गया। जमुई की चंद्रमुंडी पुलिस ने गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया।

चार साल बाद जब वह जेल से छूटा तो पहले से अधिक ख़ूंख़ार हो चुका था। 2011 में कुख्यात नक्सली प्रकाश महतो के दस्ते में शामिल होकर बिहार-झारखंड में नक्सली घटनाओं को अंजाम देने लगा। गिरिडीह के मशहूर क़ैदी वाहन ब्रेक कांड में चिराग़ दा के साथ ये भी शामिल था। 2012 के उस कांड में नक्सलियों ने कैदियों को ले जा रही पुलिस की गाड़ी पर बम से हमला करके अपने 6 नक्सली साथियों को रिहा करवा लिया था।

इतना ही नहीं, बलबीर पर पाकुड़ के तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार की हत्या का मास्टरमाइंड होने का भी आरोप है। 2 जुलाई, 2013 को हुए इस हमले में एसपी अमरजीत बलिहार समेत कुल 6 जवान शहीद हो गए थे। इसके अलावा बलबीर पर सारंडा जंगल मुठभेड़ समेत करीब दो दर्जन मामलों में शामिल होने का आरोप है।

क़ैदी वाहन ब्रेक कांड के पश्चात नक्सल संगठन में इसकी तूती बोलने लगी। बलबीर के कारनामों को देखते हुए संगठन ने इसको बड़ी ज़िम्मेदारी दे दी। उसे पूर्वोतर बिहार के स्पेशल एरिया कमेटी का सदस्य बनाने के साथ ही कई बड़ी ज़िम्मेदारियां सौंप दी गईं।

इसी बीच बलबीर को एक महिला नक्सली मोनिका से प्रेम हो गया। बात आगे बढ़ी तो लोगों की परवाह किए बिना उसने मोनिका से शादी कर ली। उधर, मोनिका नक्सल संगठन में महिला नक्सलियों के शोषण से बुरी तरह परेशान थी। अरसे से वह जंगल से बाहर निकलना चाहती थी। शादी के बाद उसे लगा कि बलबीर उसकी बात समझेगा और जंगल से बाहर वो दोनों चैन की जिंदगी जिएंगे। पर हुआ इसका उलटा। बलबीर को खून खराबे की जिंदगी इतनी रास आने लगी थी कि उसने अपनी पत्नी की एक ना सुनी। थक-हारकर जब मोनिका ने अकेले ही सरेंडर करने का इरादा बना लिया तो बलबीर ने उसे तलाक दे दिया। इसके बाद मोनिका ने जमुई में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया।

पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई। मोनिका तो सरेंडर करके मुख्यधारा में आ गई पर बलबीर अभी वहीं था। बलबीर का दिल नक्सल संगठनों द्वारा अमानवीय घटनाओं, संगठन के लोगों में व्याप्त लालच, महिलाओं के साथ शोषण से लगातार टूटता चला गया। वो चाहकर भी वहां कुछ कर नहीं पा रहा था क्योंकि उस भय और आतंक का वो खुद हिस्सा था। इसी बीच उसे कुछ बीमारियों ने धर दबोचा। बलबीर को लगा कि उसके संगठन के लोग बुरे वक्त में उसकी मदद करेंगे, लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। धीरे-धीरे करके इसका कद घटाया जाने लगा। यानी, एकबार फिर जिंदगी वैसी ही जिल्लत भरी हो गई, जिससे आजिज आकर इसने हथियार उठाया था। अब उसके पास सरेंडर करने के अलावा कोई विकल्प् नहीं बच गया था। फिर लंबी कवायद के बाद 7 फरवरी, 2019 को बलबीर ने गिरीडीह प्रशासन के सामने सरेंडर कर दिया।

सरेंडर के बाद प्रशासन ने बलबीर को प्रेस के सामने लाया जहां प्रशासन के कई उच्च अधिकारी मौजूद थे। बाकायदा एक कार्यक्रम आयोजित करके पुलिस प्रशासन ने बलवीर का मुख्यधारा की जिंदगी में स्वागत किया। प्रशासन की तरफ से उसे 25 लाख रुपए का चेक और 2 लाख रुपए कैश भी दिया गया ताकि मुख्यधारा में आकर वह अपना जीवन-यापन कर सके।

ये सच है कि जिंदगी में कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि समाज और व्यवस्था से मन खट्टा हो जाता है। बलबीर के साथ भी तो यही हुआ था, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हथियार उठा लिया जाए। बलबीर की कहानी ऐसे तमाम लोगों के लिए एक सबक है जो किसी क्षणिक आवेश या किसी घटना विशेष से आहत होकर जंगल का रास्ता अपनाना चाहते हैं।

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