कभी पहचान थी नक्सली की, आज हैं बच्चों के फेवरेट साइंस टीचर

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शिक्षा और बौद्ध‍िक विकास बच्चों के सुनहरे भविष्य के दरवाज़े खोलती है, जो उन्हें नक्सलवाद की तरफ जाने से रोकती है- क्या आपको यकीन होगा कि यह बात नक्सली रह चुके एक इंसान ने कही है। जी हां, कोलकाता के सुदूर बशीरहाट में रहने वाले सुभाष चंद्र कुंडू कभी नक्सली थे। बंदूक लेकर जंगलों में फिरते रहते थे। लेकिन आज सुभाष अपने दम पर लाखों गरीब बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, ताकि वो जिंदगी में कभी गलत राह न चुनें। करीब 30 साल पहले इसी फलसफे ने उनकी जिंदगी बदली थी। किसी जमाने में नक्सली आन्दोलनों में सक्रिय रहने वाले कुंडू आज बच्चों के फेवरेट टीचर हैं।

करीब पांच दशक पहले राजा बाजार साइंस कॉलेज से एमएससी करने के दौरान वे नक्सल आंदोलन से जुड़ गए। 1968 से 1971 के बीच कुंडू राजनीति में सक्रिय रहे। उस वक्त वे बशीरहाट कॉलेज में पढ़ाते थे। वह कहते हैं कि मुझे पूरा एहसास है कि मैंने उस आंदोलन के वक्त कई तरह की गलतियां कीं। कई गलत फैसले किए। हालांकि उस आंदोलन से जुड़ने का उनका मकसद कभी गलत नहीं रहा। वह हमेशा वंचितों की सेवा करना चाहते थे। पुलिस द्वारा डम डम सुधार केंद्र भेजे जाने और 1974 में वहां से रिहा होने के बाद उन्होंने सशस्त्र क्रांति का रास्ता छोड़ने का मन बना लिया। उन्हें अपनी भूल का एहसास हो चुका था। उन्होंने तय किया कि वे गरीब बच्चों के लिए विज्ञान की शिक्षा का प्रसार करेंगे।

अपने स्टूडेंट्स के साथ सुभाष चंद्र कुंडू

वह कहते हैं, “मैंने नक्सलवाद के हिंसक रास्ते को चुनने की गलती की है, पर आज संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर की शिक्षा को मानता हूं। मेरे अतीत की कई बातें याद रखने योग्य नहीं हैं। मगर कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें आज मैं ढूंढता रहता हूं। छात्र आंदोलन ऐसी ही एक चीज है। आज के मुकाबले पहले के छात्र आंदोलन ज्यादा ईमानदार हुआ करते थे। मैं कह सकता हूं कि विद्यार्थी जीवन में छात्र आंदोलनों से जुड़ने के कारण ही मेरे दिमाग में अपना कोचिंग इंस्टीट्यूट खोलने का विचार आया था। बाबा साहेब की शिक्षा किसी भी तरह की हिंसा को जायज न ठहराकर सामाजिक जागरुकता और शिक्षा पर जोर देती है। यही वजह है कि मैंने किसी गरीब बच्चे से ट्यूशन के पैसे नहीं लिए, क्योंकि मेरी तनख्वाह मेरे जीवन-यापन के लिए पर्याप्त थी। रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन भी मेरी जरूरतों के लिए काफी है। मैं चाहता हूं कि बच्चे विज्ञान की शिक्षा से वंचित न रहें। खासकर गरीब परिवारों से आने वाले छात्र।”

उनके कहना है, “मैं मानता हूं कि विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए कोई भी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकता। किसी भी विज्ञान की कुदरती फितरत विलुप्त होने की है, इसलिए मैं छात्रों को जितना संभव हो सके, इसके प्रति आकर्षित करने की कोशिश करता हूं। शिक्षकों से मेरा आग्रह है कि वे अपनी गंभीर जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निभाएं।”

1988 में अपने भाईयों से खरीदे हुए छोटे से प्लाट पर इन्होंने फिजिक्स इंस्टिट्यूट की शुरुआत की थी। कुंडू आज भी वहीं फीजिक्स की फ्री क्लासेस चलाते हैं। वह हमेशा अपने पुराने छात्रों का धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने तीन दशकों से इस संस्थान के विकास में बहुत सहयोग किया है। हालांकि अभी भी यहाँ बेसिक सुविधाओं की कमी है। बच्चे जमीन पर ही बैठ कर पढ़ते हैं।  फिर भी अपने हौसले के दम पर उनके बच्चे आई.आई.टी. और सेंट जेविअर्स (कोलकाता) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपना लोहा मनवा रहे हैं। उनके कई पूर्व छात्र आज शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

करीब 71 साल के कुंडू इस बात में विश्वास रखते हैं कि विज्ञान की शिक्षा ही वह रास्ता है, जो इन गरीब बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य के रास्ते खोल सकती है। विज्ञान इन बच्चों को आगे लेकर जा सकता है। इससे उन्हें रोजगार मिल सकता है।

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