बस्तर की बिटिया बनेगी डॉक्टर

माया कश्यप

“हर रोज गिर कर भी मुकम्मल खड़े हैं, ऐ जिंदगी देख मेरे हौसले तुझसे भी बड़े हैं…” जी हां, कुछ ऐसा ही हौसला दिखाया है बस्तर की बेटी माया कश्यप ने। माया अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है। यानी अब बस्तर की ये बिटिया डॉ. माया कश्यप बन जाएगी। उसने बस्तर में ही रहकर सेवा करने का संकल्प भी लिया है।

छत्तीसगढ़ के सुकमा ज‍िले का दोरनापाल इलाका, जहां नक्सली घटनाएं और पुलिस-नक्सली मुठभेड़ आम बात है। नक्सलियों की इतनी दहशत है कि यहां कोई नौकरी करने को तैयार नहीं। यहां की बहुसंख्यक आबादी आज भी समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग है। ऐसे में यहां पढ़ाई करना किसी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन इन विषम परिस्थितियों में भी यहीं की आदिवासी लड़की ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर एक मिसाल कायम किया है।

माया कश्यप

एक आदिवासी लड़की के लिए यह कितनी बड़ी कामयाबी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दोरनापाल के प्राइमरी स्कूलों में सिर्फ 3,000 बच्चे हैं। यह आंकड़ा हॉस्टल सुविधा वाले स्कूलों का है। सुकमा के दोरनापाल में नक्सलियों के खौफ से शिक्षक वहां जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते हैं। ऐसे में हाई-स्कूल तक की पढ़ाई करना बहुत मुश्किल काम है और मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना तो और भी दूर की कौड़ी है।

गांव के स्कूलों में शायद ही कभी कोई अध्यापक जाता हो। ऐसे ही एक स्कूल से माया कश्यप ने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की है। 19 साल की माया इस इलाके में मेडिकल परीक्षा पास करने वाली पहली लड़की हैं और कुछ सालों में यहां की पहली महिला डॉक्टर बन जाएंगी।

माया ने बताया कि बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना था। माया के शिक्षक पिता रामचंद्र कश्यप का 2009 में निधन हो गया था। उस समय वह 6वीं कक्षा में पढ़ती थीं। इसके चलते आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई। 12 हजार रुपए पेंशन में तीन बहनों, एक भाई व मां का गुजारा करना और उसके साथ-साथ पढ़ाई उतनी आसान नहीं थी। इसके बावजूद माया ने कभी हालात के आगे हार नहीं मानी। परिवार के सभी लोगों से हमेशा प्रोत्साहन मिलता रहा। मेडिकल की पढ़ाई के लिए भैया अनूप व भाभी रत्ना मित्रों से रुपए की व्यवस्था कर भेज रहे हैं, ताकि पिता का सपना पूरा हो सके।

माया ने बताया कि पांचवीं के बाद छिंदगढ़ स्थित नवोदय विद्यालय में चयन हुआ था। 11वीं और 12वीं की पढ़ाई ओडिशा के इस नवोदय विद्यालय से पूरी की। फिर भिलाई में एक साल रहकर नीट की कोचिंग ली, इसके बाद उनका डेंटल में चयन हो गया। डेंटल में चयन होने के बाद माया को लगा कि उनके सपने टूट जाएंगे, हालांकि उन्होंने इसके बाद भी हार नहीं मानी और फिर से एमबीबीएस की तैयारी की और सेलेक्शन करवा कर ही मानीं।

माया कश्यप

उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा से डॉक्‍टर बनने का सपना देखा था जो पूरा होने वाला है। मेरी मां ने हम तीन भाई-बहनों का पालन-पोषण बड़ी मुश्‍क‍िलों से किया है। बतौर जेब-खर्च केवल 500 रुपए मिलते थे। इतने में ही महीने भर का खर्च चलाना होता था। नीट की परीक्षा की तैयारी के समय पैसों को लेकर काफी मुश्‍क‍िलें सामने आईं। लेकिन मैंने हार नहीं मानी, मैं अपने सपने को हारते हुए नहीं देख सकती थी। जो सपना देखा था, वह अब पूरा होने वाला है।”

यह पूछने पर कि डॉक्टर बनकर वे कहां काम करना चाहेंगी, माया तपाक से कहती हैं- सुकमा में। वे कहती हैं कि डॉक्टर बनकर गरीबों की सेवा करना ही उनका उद्देश्य है। यहां सुकमा में स्वास्थ्य सुविधाओं की बहुत जरूरत है।

2018 की नीट परीक्षा में माया ने 12,315वां स्थान प्राप्त किया था। वहीं, अनुसूचित जनजाति वर्ग में उन्हें 154वां स्थान मिला था। उन्होंने अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसी साल मई में इस कॉलेज को 100 एमबीबीएस सीटों की मंजूरी दी थी।

परीक्षा पास करने के बाद माया के परिवार में खुशी थी लेकिन, उनकी फीस को लेकर चिंता भी थी। ऐसे में बड़े भाई अनूप कश्यप और भाभी रत्ना सामने आए। अनूप छत्तीसगढ़ पुलिस में सिपाही हैं और दंतेवाड़ा में तैनात हैं। अनूप ने अपने करीबी लोगों और मित्रों से कर्ज लिया। माया की भाभी रत्ना कश्यप ने भी अपने रिश्तेदारों से पैसे इकट्ठे किए। तमाम मुश्किलों के बाद आखिरकार माया का दाखिला हो गया। वे कहती हैं कि अब वे अपने इलाके और लोगों की सेवा करना चाहती हैं। माया को 2023 में अंबिकापुर मेडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री मिल जाएगी।

माया कश्यप

छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने माया से मुलाकात कर उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें बधाई दी थी। हमारी ओर से भी बस्तर की इस होनहार बेटी को बहुत-बहुत बधाई।

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