रवीन्द्रनाथ टैगोर… जिन्होंने लिखे दो देशों के राष्ट्रगान

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Rabindranath Tagore Birth Anniversary: आज महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती है। 7 मई, 1862 के ऐतिहासिक दिन साहित्य और कला से ओत प्रोत गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। बंगाली कैलेंडर के अनुसार, उनका जन्म 9 मई को भी माना जाता है। विश्व साहित्य में अद्वितीय योगदान के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर को एक महाकवि, महान उपन्यासकार और साहित्य के प्रकाश स्तम्भ के रूप में याद किया जाता है। वे सिर्फ एक लेखक ही नहीं थे, एक महान कवि, बेमिसाल संगीत रचयिता और प्रेरक शिक्षक के साथ अनूठी शैली के चित्रकार भी थे। गुरुदेव एवं कविगुरु, रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपनाम थे। इन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम से भी जाना जाता है। 13 नवंबर, 1913 को उन्हें उनकी रचना ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत और पूरे एशिया में साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। सही शब्दों में, वे एक ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं, जिन्होंने अपने प्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित किया।

देवेंद्रनाथ ठाकुर और शारदा देवी के चौदहवीं संतान के रूप में एक प्यारे से सुंदर शिशु का जन्म हुआ। प्यार से रवि नाम रखा गया। यही शिशु आगे चलकर रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम से इतिहास में अमर हो गया। रवीन्द्रनाथ का बचपन उनके बड़े भाई ज्योतिरीन्द्रनाथ के कुशल सानिध्य में बीता। वे एक कवि, नाटककार और संगीतकार थे। रवीन्द्रनाथ के ऊपर उनका बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन में शिक्षक घर पर ही पढ़ाने आते, लेकिन बालक रवीन्द्र अन्य बालकों की तरह स्कूल ड्रेस पहनकर स्कूल जाना चाहते थे। घरवालों ने सेमिनरी स्कूल में दाखिला दिलवा तो दिया। पर, जल्द ही स्कूल के व्यवस्था और माहौल से उनका मन उचट गया और रवि ने स्कूल को अलविदा कह दिया। उन्होंने स्कूल भले ही छोड़ दिया लेकिन वह तो जन्म से ही विद्या के साधक थे, तो बस गहन अध्ययन में लीन रहने लगे। उनकी प्रतिभा देख उनके बड़े भाई ने उन्हें मुम्बई पढ़ने के लिए भेज दिया ।

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महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के साथ रवीन्द्रनाथ टैगोर

सितंबर, 1878 में रवीन्द्रनाथ बड़े भाई सत्येन्द्रनाथ के साथ इंग्लैंड गए। अपने इस विदेश यात्रा के हर अच्छे बुरे अनुभव को वे अपने परिजनों को पत्रों में लिखा करते थे। लंदन के बारे में उन्होंने लिखा, “ऐसा मनहूस शहर मैंने पहले कभी नहीं देखा…धुन्ध और धुएं से लिपटा…सीलन भरा। सब-के-सब बेहद हड़बड़ी में भागते, एक दूसरे का कंधा छीलते हुए। यहां हर सड़क के नुक्कड़ पर मधुशाला हैं, लेकिन किताबों की दुकानें इक्का-दुक्का ही हैं।” सत्रह महीने बाद वे वापस भारत लौट आए। विदेश की स्मृतियों और स्वदेश की पूर्व स्मृतियों के बीच चल रहे अंतर्द्वन्द ने ‘भग्न हृदय’ की रचना की। यह रचना उनके युवा मन की मुखर अभिव्यक्ति थी। रवीन्द्रनाथ पहले अपने पारिवारिक पत्रिका ‘भारती’ के लिए लिखते थे। बाद में एक पत्रिका ‘बालक’ के लिए भी शिशु गीत, कवितायें, कहानियां नाटक और लघु उपन्यास लिखने लगे। 22 अगस्त, 1880 को अपने अधूरे अध्ययन को पूरा करने वे वापस लंदन चले गए। 10 साल के अध्ययन के बाद नवंबर, 1890 में वापस भारत आए।

इन 10 सालों में उनकी लेखनी में महत्वपूर्ण बदलाव आ चुका था। अब अपनी लेखनी से वे पाठकों के मन को अंदर तक झकझोर देते थे। लेकिन उनके पिता की इच्छा थी कि रवीन्द्र पारिवारिक सम्पतियों की देख-रेख भी करें और अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं। पिता की इच्छा को मानकर अपने बीवी बच्चों को लेकर वे सियालदह आ गए। यहीं पर उन्होंने विलक्षण नाटिका ‘चित्रांगदा’ तैयार किया। जो बाद में ‘चित्रा’ के नाम से प्रकाशित हुई। इसी समय उन्होंने बाल कहानी ‘डाकपाल’ और विश्व प्रसिद्ध कहानी ‘काबुलीवाला’ की रचना की। दिसम्बर, 1901 में रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने दो पुत्रों और पांच विद्यार्थियों के साथ पिता द्वारा स्थापित शांति निकेतन चले आये। वहां एक विद्यालय की स्थापना की। उस विद्यालय का नाम ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ रखा गया। शिक्षा और शिक्षक के बारे में उन्होंने लिखा, ‘शिशुओं को शिक्षा देने के लिए स्कूल नाम के जिस यंत्र का आविष्कार हुआ है, उसके द्वारा मानव-शिशुओं की शिक्षा बिल्कुल भी पूरी नहीं हो सकती। सच्ची शिक्षा के लिए आश्रम की आवश्यकता पड़ती है, जहां समग्र जीवन की सजीव पृष्ठभूमि मौजूद रहती है।’

शांति निकेतन में रहते हुए सन् 1909 से 1910 के बीच लिखे गीतों का एक संकलन ‘गीतांजलि’ के नाम से प्रकाशित हुआ। स्वास्थ्य कारणों से वो वापस सियालदह आ कर रहने लगे। यहीं पर ‘गीतांजलि’ का अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया। जिसे सन् 1912 में एक ब्रिटिश पत्रिका ने प्रकाशित किया। इस रचना ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को विश्व पटल पर ला कर खड़ा कर दिया। सन् 1913 में उनकी रचना “गीतांजलि” के लिये उनको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वो प्रथम भारतीय हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर न केवल भारत के राष्ट्रगान के रचयिता हैं बल्कि उन्होंने ही बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी लिखा। इसके लिए भारत और बंग्लादेश हमेशा उनके कर्ज़दार रहेंगे। भारत का राष्ट्रगान “जन-गण-मन” और बांग्लादेश का राष्ट्रगान “आमार सोनार बांग्ला” गुरुदेव ने लिखा।

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वहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगीत ‘श्रीलंका मथा’ भी टैगोर की कविताओं की प्रेरणा से बना है। इसे लिखने वाले आनंद समरकून शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के पास रहे थे और उन्होंने कहा था कि वे टैगोर स्कूल ऑफ पोएट्री से बेहद प्रभावित थे। अपने जीवन काल में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने हजारों कविताएं, लघु कहानियां, गाने, निबंध, नाटक आदि लिखे। इसके अलावा उन्होंने कई सामाजिक और काव्यात्मक कविताएं और उपन्यास लिखे, जिनमें पूरवी, मनासी, गलपगुच्छा, सोनार तारी, कल्पना, नैवेद्या और गोरा, चित्रांगदा या चित्रा, मालिनी, बिनोदिनी, नौका डुबाई, राजा और रानी प्रमुख हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर को उनकी अनेकों प्रसिद्ध औरअलौकिक रचनाओं के लिए ब्रिटिश क्राउन द्वारा ′नाइटवुड′ से सम्मानित किया गया। बाद में सन् 1919 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला बाग में नरसंहार के विरोध में इस सम्मान को वापस कर दिया।

टैगोर की लोकप्रिय किताबों में से एक ‘द किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ भी है। जिसकी बीते साल अमेरिका में सात सौ डॉलर (करीब 45 हजार रुपये) में नीलामी हुई है। ये किताब 1916 में मैकमिनल कंपनी ने प्रकाशित की थी, जो टैगोर के हिंदी में लिखे नाटक ‘राजा’ का अंग्रेजी अनुवाद है। इस नाटक की कहानी एक रहस्यमय राजा से जुड़ी है। रवींद्रनाथ टैगोर की 3,500 कविताओं का एक डिजिटल संग्रह भी है। खास बात ये है कि इस संग्रह में ऐसी 15 कविताएं मौजूद हैं, जिनका पाठ खुद टैगार ने किया था। अन्य 245 कविताओं का पाठ वक्ताओं ने किया है। इस संग्रह को पुर्णेंदु विकास सरकार ने तैयार किया है। इसमें कविताओं की प्रस्तुति के अलावा ‘रबींद्र कोबिता आर्काइव’ में 110 रबींद्र संगीत और 103 अंग्रेजी कविताओं को भी शामिल किया गया है।

टैगोर और महात्मा गान्धी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी जी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। टैगोर ने गांधीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। वहीं, गांधीजी ने उनके सम्मान में उन्हें गुरूदेव उपनाम दिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु 7 अगस्त, 1941 को कोलकाता हुई। एक महान कवि, देशभक्त, दर्शनशास्त्री, मानवतावादी और चित्रकार के रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर हर भारतीय के दिल में हमेशा जीवित रहेंगे। जब कभी भी भारतीय साहित्य के इतिहास की चर्चा होगी तो वह गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम के बिना अधूरी ही रहेगी। भारतीय साहित्य गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के योगदान के लिए सदैव उनका ऋणी रहेगा।

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