एक दशक में आतंकियों से ज्यादा नक्सलियों ने बहाया खून, पढ़िए हैरान कर देने वाला खुलासा

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छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण दिशा में स्थित है बस्तर जिला। यह जिला मुख्य तौर से घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों, झरनों, गुफाओं और वन्य प्राणियों से भरा हुआ है। बस्तर, प्रदेश के कोंडागांव, सुकमा और बीजापुर जिलों से घिरा हुआ है। गगनचुंबी पहाड़ों और घने जंगलों से घिरे होने की वजह से बस्तर के कई इलाके सालों से नक्सलियों के लिए भी सुरक्षित पनाहगाह रहे हैं। नक्सली इन इलाकों में अपनी पैठ अंदर तक बना चुके हैं। स्थानीय गांव वालों को बंदूक की नोंक पर धमका कर नक्सली यहां खुलेआम खौफ का खेल खेलते रहे हैं। गांव वालों के बीच दहशत का आलम यह था कि यहां लोग पलायन करने के लिए मजबूर हो गए। दरअसल, नक्सली बस्तर के बीहड़ों में तमंचे के दम पर जन अदालत लगाकर खुद को न्याय का पहरुआ बताते रहे हैं। इतना ही नहीं वो लोगों को खुलेआम सजा भी देते रहे हैं।

पर अब हालात बदले लगे गए हैं। सुरक्षाबलों की मुस्तैदी और लगातार हो रहे विकास कार्यों के चलते बस्तर इलाके में नक्सलियों का दायरा सिमटता जा रहा है। बाकी राज्यों में वैसे ही उनका वजूद ना के बराबर रह गया है। स्थानीय लोग भी अब दोमुंहे नक्सलियों के असली चरित्र से वाकिफ होने लगे हैं। इसके चलते नक्सलियों में बौखलाहट बढ़ गई है। 10 साल पहले जिन इलाकों के नाम तक से सिहरन होने लगती थी अब वहां लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी है। कहने की जरुरत नहीं कि ये सुरक्षाबलों की चौकसी के चलते ही मुमकिन हो पाया है। फिर भी देश के तमाम राज्यों में अपनी जमीन खो चुके नक्सली, छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में डटे हुए हैं। वो किसी भी कीमत पर अपना ये गढ़ नहीं खोना चाहते। एक तरह से यह उनके लिए अस्तित्व का संकट बन चुका है। यही वजह है कि अपनी इस बौखलाहट में वो किसी भी कीमत पर वारदातों को अंजाम देकर अपनी दहशत कायम रखना चाहते हैं। इसकी मिसाल हैं आए दिन होने वाली हिंसक वारदातें।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, पिछले एक महीने में नक्सलियों ने बस्तर के बीजापुर, सुकमा और नारायनपुर में कुल 10 गांव वालों की हत्याएं की हैं। इस तरह का फैसला लेने के लिए नक्सलियों ने जन अदालत बना रखा है। कहने को तो यह जन अदालत है, पर यहां मासूम जनता और निर्दोष गांववालों पर केवल जुल्म ढाने का काम होता है। नक्सलियों के इसी जन अदालत ने गांव के 31 परिवारों को गांव से बाहर जाने का आदेश भी सुनाया है। हाल ही में नक्सलियों की जन अदालत ने यह कहते हुए बीजापुर और सुकमा में 4 तथा नारायनपुर में 5 लोगों की हत्या करने का फैसला सुनाया था कि ये लोग पुलिस के मुखबिर हैं।

नक्सली ज्यादातर मासूम गांव वालों पर पुलिस की मुखबिरी करने का आरोप लगाकर उन पर जुल्म ढाते हैं, उन्हें मारते पीटते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या कर देते हैं। कुछ दिन पहले ही नक्सलियों ने एक ग्रामीण कदली गंगा को उसके घर से घसीटकर निकाला और सरेआम उसका गला काट दिया। हत्यारों ने उसका शव बीच राह पर छोड़ दिया और उसके शव के पास धमकी भरा एक पर्चा छोड़कर चले गए। इसी तरह, सुकमा के गुदम गांव में नक्सलियों ने दो गांव वालों पोड़ियम मुन्ना और लाके लच्छू को घर से निकाल कर उनकी बुरी तरह पिटाई की और अपने साथ जंगल में ले गए।

बाद में मुख्य सड़क पर उन दोनों का शव मिला। नक्सली पुलिसकर्मियों के रिश्तेदारों को भी निशाना बना रहे हैं। उन्हें वे पुलिस का जासूस कह कर मार डालते हैं। बीजापुर के एक गांव में नक्सलियों ने कुछ ही दिनों पहले दो ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी। इनमें से एक असिस्टेंट इंस्पेक्टर का रिश्तेदार था। दहशत में जी रहे गांव वाले पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। हालांकि, सुकमा में एक गांव के सरपंच ने अपने यहां हुई घटनाओं की लिखित शिकायत पुलिस को दी है। पुलिस इन मामलों की जांच कर रही है।

अब जरा एक नजर डालते हैं कि पिछले कुछ सालों में नक्सलियों ने कितने लोगों का लहू बहाया है।

साल – हत्या
2018 – 59
2017 – 32
2016 – 36
2015 – 33
2014 – 25
2013 – 55
2012 – 32
2011 – 37
2010 – 78
2009 – 76

यह आंकड़े बताते हैं कि 2009, 2010 के मुकाबले पिछले कुछ सालों में नक्सल हिंसा में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। फिर भी ये सच है कि बस्तर में नक्सली नासूर बन गए हैं। बस्तर में नक्सलियों से दिन-रात लोहा ले रहे कुछ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, नक्सलियों ने अपने कैडर को बदल दिया है। संगठन में ज्यादातर लोग नए हैं। इसका कारण है चौतरफा दबाव और कल्याणकारी योजनाओं के तहत बड़े-बड़े नक्सलियों का सरेंडर।

यह भी पता चला है कि बड़ी संख्या में नक्सली दूसरे राज्यों से आए हैं और वे अबूझमाड़ के लोगों को गांव छोड़ कर जाने के लिए धमका रहे हैं। पिछले एक दशक में बस्तर में 459 आम नागरिकों की हत्याएं हुई हैं। यह संख्या जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की वजह से हुई हत्याओं से कहीं अधिक है।

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