ममता की राजनीति CBI के दुरुपयोग से ज्यादा घातक है

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3 फरवरी की शाम से कोलकाता के हार्टलैंड में जो कुछ हो रहा है, उससे तो यही कहानी समझ आ रही है कि देश का लोकतंत्र खतरे में है। खतरा इतना बढ़ गया है कि उसे बचाने के लिए एक सूबे की सीएम को धरना पर बैठना पड़ गया। नारा दिया ‘सेव डेमोक्रेसी’। क्या मजाक है!

आजाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि सीबीआई ने किसी सर्विंग पुलिस कमिश्नर के घर या दफ्तर या फिर दोनों ही जगहों पर छापा मारा हो। और, ये भी पहली बार हुआ है कि किसी सूबे की मुख्यमंत्री खुले तौर पर किसी दागी पुलिस कमिश्नर के बचाव में आई हो। इतना ही नहीं उसकी तारीफ में कसीदे गढ़े हों (ममता ने ट्वीट करके कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ पुलिस कमिश्नर करार दे दिया)।

बहरहाल, कोलकाता में चल रहे इस हाई वोल्टेज ड्रामा पर कमोबेश सभी पब्लिकेशन ने अपनी संपादकीय टिप्पणियां दी हैं। जहां, डेक्कन हेराल्ड की संपादकीय ने इसे ‘निचले स्तर की राजनीति’ करार दिया गया है, वहीं टाइम्स ऑफ़ इंडिया का संपादकीय कहता है कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने धरना कर के बेवजह एक संवैधानिक संकट को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें जांच में सहयोग करना चाहिए था। बंगाल जैसे राजनीतिक दृष्टि से अस्थिर राज्य में उनका यह कदम अराजकता पैदा कर सकता है। तो इकोनॉमिक टाइम्स ने लिखा है कि यह त्रिणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक लड़ाई है जिसमें CBI और संघीय ढांचे को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस का रुख एकदम अलग है। इसका संपादकीय कहता है कि CBI के इस एक्शन की टाइमिंग और तरीका, दोनों से ही जाहिर है कि यह प्रतिशोध की राजनीति है। यह दोनों ही तरफ से शॉर्ट-टर्म सियासी लाभ के लिए किया जा रहा है। वहीं, जनसत्ता ने अपने संपादीय में इसे हैरान करने वाली घटना करार दिया है। संपादकीय कहता है, इस घटना के राजनीतिक पहलू चाहे जो हों, पर सीबीआई और राज्य पुलिस के बीच टकराव को लेकर जो सवाल उठे हैं वे गंभीर हैं। ऐसा टकराव देश के संघीय-ढांचे के लिए चुनौती है।

दैनिक जागरण ने इस घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जाजनक करार दिया है। जागरण का संपादकीय कहता है कि ममता बनर्जी इस मामले को राजनीतिक रंग देने के लिए धरने पर बैठ गई हैं। उन्हें सीबीआई की कार्रवाई से आपत्ति थी तो अदालत में जाना चाहिए था। कुछ ऐसा ही मत अमर उजाला की संपादकीय में भी है। अमर उजाला ने अपने संपादकीय में लिखा है कि ममता बनर्जी CBI पर आरोप लगा रही हैं, पर सच्चाई यह है कि कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने CBI के समन को लगातार नजरअंदाज किया है। संघीय व्यवस्था केंद्र और राज्य दोनों के सहयोग से चलती है। पुलिस और सीबीआई जैसी संस्थाओं की मर्यादा और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सरकारों को उनका राजनीतिक उपयोग नहीं करना चाहिए। साथ ही ऐसी संस्थाओं के अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे सरकारों का मोहरा बनकर काम न करें।

उधर, हिंदुस्तान का संपादकीय कहता है कि लोगों के लिए यह तय कर पाना भी मुश्किल हो गया है कि कौन बड़ा तोता है, केंद्र सरकार की सीबीआई या पश्चिम बंगाल सरकार की राज्य पुलिस? तो पत्रिका का संपादकीय लिखता है कि राजनीति में मतभेद और मनभेद अपनी जगह हो सकते हैं लेकिन केंद्र और राज्य का इस तरह आमने-सामने आ जाना कहीं ना कहीं संवैधानिक संकट जैसी स्थिति है। देश का संघीय ढांचा केंद्र के साथ ही राज्यों को भी स्वायत्तता प्रदान करता है। संविधान में दोनों की भूमिका निर्धारित है। केंद्र राज्यों के भीतर एक सीमा तक ही दखल दे सकता है। राज्यों के लिए भी जरूरी है कि वे भी केंद्र के साथ रिश्तों में सद्भावनापूर्ण रवैया अपनाएं।

तो नवभारत टाइम्स ने अपनी संपादकीय में सीबीआई की साख पर सवाल उठाया है। संपादकीय लिखता है कि इस झगड़े से सीबीआई की विश्वसनीयता को वैसा ही आघात लगा है जैसा कुछ समय पहले इसके दो आला अफसरों के झगड़े से लगा था। जाहिर है, देश की आला जांच एजेंसी का कमजोर पड़ना, उस पर लोगों का भरोसा कम होना हमारे समूचे सिस्टम के लिए बहुत खतरनाक संकेत है।

इस तरह अलग-अलग मीडिया हाउसेज का संपादकीय मत अलग-अलग है। सिर्फ सच की संपादकीय टीम का मत है कि सीबीआई का सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल तो इसके अस्तित्व में आने के समय से ही होता रहा है। कोई दलील दे सकता है कि इस सरकार में इसका इस्तेमाल कम या अधिक हुआ है। लेकिन जरूरी बात ये है कि अगर कोई मुख्यमंत्री या राज्य सरकारें इस तरह व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतर आएंगी तो ये देश के संघीय ढांचे के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। और हकीकत ये है कि ऐसा नजारा खुलेआम पेश किया जा रहा है, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक अलार्मिंग सिचुएशन है।

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