महाराणा प्रताप की ज़िंदगी से जुड़े रोचक किस्से: बादशाह अकबर भी था इनका मुरीद

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Maharana Pratap Jayanti 2019: वीरता, स्वाभिमान और देशभक्ति की मिसाल महाराणा प्रताप की आज 479वीं जयंती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 9 मई की तारीख और हिन्दू पंचांग के अनुसार उनकी जयंती हर साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। महाराणा की शूरवीरता से भारतीय इतिहास गुंजायमान है। इस महान योद्धा ने हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की विशाल सेना को नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया और आखिरी सांस तक मेवाड़ की रक्षा की। महाराणा की बहादुरी को देखकर उनका सबसे बड़ा दुश्मन अकबर भी उनका कायल हो गया था। महाराणा प्रताप ने जीवनभर संघर्ष किया और सालों तक जंगलों में रहकर जीवन व्यतीत किया। घास की रोटियां खाईं और गुफा में सोए लेकिन मुगलों की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की।

महाराणा प्रताप का भाला

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को मेवाड़ के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप के पिता मेवाड़ के राजा उदयसिंह और माता महारानी जयवंता बाई थीं। प्रताप बचपन से ही वीर और साहसी प्रवृत्ति के थे। महाराणा प्रताप का कद 7 फीट एवं उनका वजन 110 किलोग्राम था। उनके सुरक्षा कवच का वजन 72 किलोग्राम था और भाले का वजन 80 किलोग्राम था। कवच, भाला, ढाल और तलवार आदि को मिलाएं तो प्रताप युद्ध में 200 किलोग्राम से भी ज्यादा वजन उठा कर युद्ध में लड़ते थे। वे युद्ध कला में इतने निपुण थे कि वह शत्रु को घोड़े समेत बीच से ही काट दिया करते थे।

मुगल बादशाह अकबर से अदावत

मेवाड़ उत्तरी भारत का एक महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली राज्य था। राणा सांगा के समय में राजस्थान के लगभग सभी शासक उनके अधीन संगठित हुए थे। इसलिए मेवाड़ की प्रभुसत्ता की रक्षा तथा उसकी स्वतंत्रता को बनाए रखना राणा प्रताप के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य था। इसी के लिए वे जिए और मरे। सन 1572 में प्रताप के शासक बनने के समय राज्य के सामने बड़ी संकटपूर्ण स्थिति थी। जब मेवाड़ की सत्ता राणा प्रताप ने संभाली, तब आधा मेवाड़ मुगलों के अधीन था और शेष मेवाड़ पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए अकबर लगातार कोशिश कर रहा था। अकबर ने महाराणा प्रताप को 6 बार संधि वार्ता का प्रस्ताव भेजा। लेकिन महाराणा ने अकबर के आगे झुकने से मना कर दिया। इससे आहत होकर अकबर ने मानसिंह और जहांगीर की अगुवाई में मेवाड़ पर आक्रमण के लिए अपनी सेना भेज दी।

हल्दीघाटी का युद्ध

31 मार्च ,1576 को महाराणा प्रताप और अकबर की सेना आमने-सामने खड़ी थी। हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ मेवाड़ी सेना बाज के समान झपट्टा मारकर मुगल सेना पर टूट पड़ी। महाराणा मुगल सेना को काटते हुए आगे बढ़ रहे थे। मुगल सेना के कई सरदार एक-एक कर महाराणा प्रताप के हाथों मारे गए। अकबर की सेना को मानसिंह लीड कर रहे थे। मानसिंह के साथ 10 हजार घुड़सवार और हजारों पैदल सैनिक थे। लेकिन महाराणा प्रताप 3 हजार घुड़सवारों और मुट्ठी भर पैदल सैनिकों के साथ लड़ रहे थे। महाराणा पर चारों तरफ से मुगल सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था। राजपूत सरदारों को लगा कि महाराणा को किसी तरह सुरक्षित निकाला जाए। कोई उपाय न देख माना झाला ने महाराणा से कहा ‘आपको सौगंध है भगवान एकलिंग की, आप निकल भागें। अभी मेवाड़ को आपकी जरूरत है। अन्तिम युद्ध तो आगे लड़ा जाना है और उसे जीतना है।’ महाराणा प्रताप ने परिस्थिति समझ कर बात मान ली। दुश्मन की सेना को चकमा देने के लिए माना झाला ने महाराणा का मुकुट अपने सर पर रख लिया। अब माना झाला को महाराणा प्रताप समझ कर मुगल सैनिक उन पर झपट पड़े। माना झाला लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। पर मेवाड़ के सूर्य को अस्त होने से बचा लिया।

चेतक ने ऐसे बचाई महाराणा की जान

उधर, महाराणा बहुत घायल हो गए थे। उनके पास कोई सहायक भी नहीं था। ऐसे में महाराणा ने चेतक की लगाम थामी और निकल लिए। उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे। पर चेतक की रफ़्तार के सामने दोनों ढीले पड़ गए। रास्ते में एक पहाड़ी नाला बहता था। चेतक भी घायल था पर छलांग मार नाला फांद गया और मुग़ल सैनिक मुंह ताकते रह गए। अब चेतक थक चुका था। वो दौड़ नहीं पा रहा था। महाराणा की जान बचाकर चेतक खुद शहीद हो गया।

हल्दी घाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप अरावली की पहाड़ियों में एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर भटकते रहे। कुछ समय तो ऐसा संकट रहा कि महाराणा और उनके परिवार को घास की रोटियां खानी पड़ीं। फिर भी महाराणा प्रताप का दृढ संकल्प हिमालय के समान अडिग और अपराजेय बना रहा। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी, ‘मैं मुगलों की अधीनता कदापि स्वीकार नहीं करूंगा और जब तक चित्तौड़ पर पुनः अधिकार न कर लूंगा तब तक पत्तलों पर भोजन करूंगा और जमीन पर सोऊंगा।’ उनकी इस प्रतिज्ञा का मेवाड़ की जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ा और वह संघर्ष में राणा प्रताप के साथ जुड़ी रही।

भामाशाह ने की महाराणा प्रताप की मदद

एक समय ऐसा भी आया जब महाराणा प्रताप बुरी तरह निराश हो गए थे। जब भामाशाह को पता चला कि महाराणा निराश हैं, तो उन्होंने महाराणा के लिए अपने खजाने खोल दिए। भामाशाह बचपन से मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार थे। साथ ही उनके खजांची भी थे। भामाशाह ने महाराणा प्रताप से कहा, ‘आप निराश न हों, फिर सेना खड़ी कर चितौड़ को स्वतंत्र कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें।’ धन्य हैं भामाशाह। ऐसे त्याग का उदाहरण इतिहास में कोई दूसरा नहीं मिलता।

अपराजेय रहे महाराणा

भामाशाह से मिली मदद बहुत कारगर सिद्ध हुई। महाराणा प्रताप ने फिर से सेना तैयार की। उनके भीतर छाई निराशा दूर हो चुकी थी और चित्तौड़ को आजाद कराने का संकल्प पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया था। महाराणा प्रताप ने वीरता के बल पर धीरे-धीरे मेवाड़ के सभी दुर्गों पर दोबारा आधिपत्य जमा लिया। महाराणा प्रताप 25 वर्षों तक अकबर के लिए चुनौती बने रहे। वे चितौड़ वापस लेने की तैयारी कर ही रहे थे। लेकिन वह पूरी न हो सकी। उनकी वज्र सी काया युद्ध करते-करते टूट गई थी। चितौड़ दुर्ग की आजादी अगली पीढ़ी पर छोड़ 29 जनवरी, 1597 को 57 वर्ष की आयु में ही इस शूरवीर ने आंखे मूंद लीं। महाराणा प्रताप इस देश के अजेय सेनानी और कभी न झुकने वाले, न टूटने वाले महापुरुष थे। भारतीयों के लिए उनकी स्मृति सदा पावन रहेगी।

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