नक्सलियों की नई चाल का पर्दाफाश, संगठन में शामिल करने के लिए दे रहे जमीन दिलाने का लालच

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कभी बहका कर, तो कभी फुसलाकर और कभी धोखा देकर…कुछ ऐसी ही फितरत का इस्तेमाल कर नक्सली युवाओं को संगठन से जोड़ते हैं। लालच देना और फिर उन्हें नक्सली चोला पहना देना ही उनकी मंशा रही है और यह बात हम नहीं कह रहे बल्कि कई बड़े नक्सलियों ने सरेंडर के बाद यह बात कबूली है। इन नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें अंधेरे से रोशनी में लाने के लिए सरकार के पास खास पुनर्वास नीति है। इस नीति के तहत अब तक कई नक्सलियों ने ना सिर्फ आत्मसमर्पण किया है बल्कि इन नीतियों के लाभ लेकर खुद को और अपने परिवार को एक नई जिंदगी दी है।

लेकिन सबकुछ गंवाने के बाद भी आतंक की राह पर चल रहे कुछ मुट्ठी भर नक्सलियों को अब सरकार की यह पुनर्वास नीति भी पसंद नहीं आ रही है। एक साजिश रच कर नक्सली अपनी पुनर्वास नीति लोगों पर जबरदस्ती थोपना चाहते हैं। दरअसल इसके पीछे भी उनकी एक ही मंशा है और वो यह कि किसी तरह कमजोर पड़ते संगठन में लोगों को लालच देकर लाया जाए और फिर उन्हें समाज का दुश्मन बनाया जाए। अब सवाल यह है कि नक्सलियों को आखिर नक्सली पुनर्वास नीति लाने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल बीहड़ों और पहाड़ों में छिपे रहने वाले नक्सली अब पूरी तरह कमजोर पड़ चुके हैं।

नक्सलियों के सफाये को लेकर सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन का असर यह हुआ है कि जंगलों से नामी-गिरामी नक्सलियों का सफाया हो चुका है। बचे हुए नक्सलियों को अब अपनी जान का खौफ सता रहा है। ‘लाल आतंक’ की चालबाजी अब गांव के लोग भी समझ चुके हैं और वो इनकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं यानी वो नक्सली संगठनों से लगातार दूरी बना रहे हैं। नक्सलियों के पास मुखबिरों तक की कमी हो गई है। नक्सलियों पर सुरक्षा बल कहर बनकर टूट रहे हैं और वो खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। छोटे पड़ते जा रहे संगठन को बढ़ाने और युवाओं को भटकाने के लिए नक्सली अपनी पुनर्वास नीति के तहत लोगों को जमीन देने का लालच दे रहे हैं जबकि उनकी खुद की जमीन खिसकती जा रही है। 5 सालों में लगभग 3 हजार से अधिक छोटे – बड़े नक्सलियों ने सरेंडर किया है। जिसमें से लगभग 150 से 200 ऐसे नक्सली है जो नक्सल संगठन के काफी बड़े पदों पर थे। जिनके सरेंडर से नक्सलियों को काफी नुकसान हुआ है।

बता दें कि सरकार की तरफ से नक्सलियों के लिए चलाई जा रही पुनर्वास नीति के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को आवास, इलाज की व्यवस्था, 10 हजार रूपए की सहायता राशि, सरकारी नौकरी, इत्यादि समेत कई सुविधाएं दी जाती हैं। सच यह है कि राह से भटके नक्सली लोगों को भटका कर उन्हें सिर्फ बंदूक थमाते हैं।

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