Birth Anniversary: बचपन में फिल्म देखने पर होती थी पिटाई, 60 रुपये की बदौलत बने बड़े सुपरस्टार

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आज जन्मदिन है, ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के दौर के मशहूर एक्टर भारत भूषण का। हिंदी सिनेमा के सुनहरे इतिहास में अंकित नाम भारत भूषण। कभी शोहरत के शिखर पर बैठा यह अभिनेता अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में पैसे-पैसे को मोहताज हो गया था। आइए उनके जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से।

भारत भूषण हिंदी सिनेमा जगत के मंझे हुए कलाकार थे। उनकी गिनती हमेशा सरल, सहज, शिष्ट और शालीन कलाकारों में होती है। अपने दौर में उनका नाम कभी भी किसी विवाद से नहीं जुड़ा था। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी भारत भूषण ने पूरी तरह सात्विक प्रवृत्तियों को अपनाया। न कभी उन्होंने मांस खाया, न मदिरा चखी। यहां तक कि सिगरेट के धुएं का स्वाद क्या होता है, इसे भी वह कभी नहीं जान पाए।

अपने करियर में कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्जा गालिब जैसे चरित्रों को नया रूप देने वाले एक्टर भारत भूषण को उनके यादगार अभिनय के लिए जाना जाता है। वे 14 जून, 1920 को मेरठ में पैदा हुए और अलीगढ़ में पले-बढ़े। दो वर्ष की आयु में उनकी मां गुजर गईं। भारत भूषण के पिता रायबहादुर मोतीलाल वकील थे। भारत भूषण के पिता चाहते थे कि उनका बेटा भी उन्हीं की तरह वकील बने। उन्होंने अपने पिता से मुखालफत करके ही एक्टिंग और संगीत की दुनिया में कदम रखा था।

भारत भूषण ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता आर्य समाजी थे। जिसके कारण उन्हें बच्चों का फिल्में देखना कतई पसंद नहीं था। एक बार पिता के किसी काम के सिलसिले में बाहर जाने पर भारत भूषण दोस्तों के साथ फिल्म देखने चले गए थे। लेकिन वह फिल्म देख के वापस नहीं आ पाए और उनके पिता घर आ चुके थे। यह जानने के बाद कि भारत फिल्म देखकर आ रहे हैं। उनके पिता ने उनकी खूब पिटाई की थी। लेकिन भारत भूषण पर तो एक्टिंग का भूत सवार था। घर से भाग कर कलकत्ता जा पंहुचे। भक्ति फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए, कलकत्ता में काम कुछ खास नहीं बना। लेकिन गायक बनने का सपना जरूर पाल बैठे।

चालीस के दशक में दिल में गायक बनने का सपना लिए मेरठ का एक नवयुवा सपनों के शहर बॉम्बे जा पहुंचा। देखने में सुंदर, सुशील, मासूमियत और शराफत से भरा। भारत भूषण जब मुंबई आए तो उनके पास मशहूर डायरेक्टर महबूब खान के लिए एक सिफारिशी खत था। महबूब खान उन दिनों ‘अलीबाबा चालीस चोर’ की शूटिंग में बिजी थे। भारत भूषण ने उन्हें वह चिट्ठी दिखाई। लेकिन तब तक उनके लिए कोई रोल नहीं बचा था। वो बेहद निराश हो गए लेकिन किसी ने उन्हें बताया कि डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा ‘भक्त कबीर’ फिल्म बना रहे हैं। इसके बाद रामेश्वर ने उन्हें फिल्म में काशी नरेश का रोल और 60 रुपए महीना की नौकरी दे दी।

भारत भूषण को पहली बार जिस फिल्म में हीरो का रोल मिला वो थी मशहूर साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के क्लासिकल उपन्यास पर बनी फिल्म ‘चित्रलेखा’। शुरूआती कई साल फिल्मों में कोई कामयाबी नहीं मिली बस फिल्में जैसे-तैसे मिलती रहीं। यह वो दौर था जब हिंदी सिनेमा में बंटवारे के बाद एक उथल-पुथल सी मची थी। लाहौर से बहुत से कलाकार बंटवारे के कारण बॉम्बे का रुख कर रहे थे और इसी के साथ ही भारतीय सिनेमा नए दौर का गवाह बनने वाला था।

उन दिनों विजय भट्ट अकबर के जमाने के महान संगीतकार ‘बैजू बावरा’ यानी बैजनाथ मिश्रा पर फिल्म बनाना चाहते थे। विजय भट्ट इसके लिए दिलीप कुमार और मधुबाला को लेना चाहते थे। पर बात बन नहीं रही थी। तब उन्होंने नए चेहरे को लेने का फैसला किया। भारत भूषण को उन्होंने इस फिल्म के हीरो के लिए चुना। साथ मे नायिका थीं मीना कुमारी। बस इस फिल्म का रिलीज होना था और भारत भूषण बन गये बॉलीवुड के एक ऐसे अदाकार जिनकी अदाकारी ने ऐतिहासिक किरदारो को जीवंत कर दिया। सिने इतिहास में भारत भूषण को ऐतिहासिक किरदारों के लिए आज भी बड़ी इज्जत के साथ याद किया जाता है। भारत भूषण गायक तो बन ना सके। पर हां, अपनी कई सफल फिल्मों में गायक का किरदार बखूबी निभाया।

सिनेमा का प्रसिद्ध फिल्मफेयर अवॉर्ड तब शुरू ही हुआ था जो पहली बार दिलीप कुमार को मिला और अगले साल ही दूसरा फिल्मफेयर भारत भूषण के हाथों में फिल्म ‘चैतन्य महाप्रभु’ के लिए आया। जिस शराफत व सरलता के साथ वे पर्दे पर दिखे, जिस मासूमियत और अदायगी के साथ वे लोगों के दिलो में उतरे, उसने उन्हें सदाबहार अभिनेता बना दिया। 1960 में आयी “बरसात की रात”। भारत भूषण व मधुबाला के अभिनय से सजी इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर पैसों की बरसात कर दी। इस फिल्म के निर्माता भी भारत भूषण ही थे। भारत भूषण के लिए यह फिल्म आर्थिक मुनाफे की खान बनी।

भारत भूषण के फिल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ का भी अहम स्थान है। इस फिल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्जा गालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि गालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फिल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। पचास के दशक में अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद जैसे सितारे फिल्म इंडस्ट्री में अपनी धाक जमा चुके थे। लेकिन भारत भूषण ने अपनी एक अलग इमेज बनाई और दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस बीच आनंद मठ, मिर्जा गालिब, बसंत बहार, फागुन, गेटवे ऑफ इंडिया, रानी रूपमती की सफलता के बाद भारत भूषण सफलता के शिखर पर जा पहुंचे।

‘आनंद मठ’ सरीखी फिल्मों में अपने अभिनय से राष्ट्रधारा के विस्तार और प्रसार को समुचित गति प्रदान करने में वह सफल और समर्थ रहे। भारत भूषण हिंदी फिल्म-संसार के अकेले ऐसे हस्ताक्षर थे, जिन्हें पढ़ने-लिखने में सचमुच रुचि थी। उनके घरेलू पुस्तकालय में कई हजार पुस्तकों का संग्रह था और प्रत्येक पुस्तक के विभिन्न पन्नों पर उनकी हस्तलिखित टिप्पणियां थीं। हर पुस्तक के कवर पर उनके हस्ताक्षरों से लिखा मिलता था, `यह पुस्तक फलां-फलां विक्रेता से खरीदी गई है और आप इसे पढ़ना चाहते हैं तो वहां से आप इसे खरीद सकते हैं। वर्ष 1964 में भारत भूषण ने अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म ‘दूज का चांद’ का निर्माण किया लेकिन यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से पिट गई इसके बाद भारत भूषण ने फिल्म निर्माण से तौबा कर ली।

वर्ष 1967 में प्रदर्शित फिल्म तकदीर बतौर मुख्य अभिनेता भारत भूषण की अंतिम फिल्म थी। भारत भूषण को महंगी व लग्जरी कारों का शौक था। वे बंगलो में रहने के आदी थे। भारत भूषण ने दो शादियां कीं। पहली शादी से उन्हें दो बेटियां हुईं, दूसरी बेटी के पैदा होते वक्त उनकी पहली पत्नी का निधन हो गया था। पत्नी शारदा दो छोटी बच्चियों को छोड़कर असमय ही विदा ले गयीं और छोड़ गयीं एक शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग बच्ची को। इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘बरसात की रात’ की हीरोइन रहीं रत्ना से शादी की।

एक समय ऐसा आया जब अपने ही लोगों से धोखा खाने के बाद भारत भूषण को भारी नुकसान झेलना पड़ा। साठ के दशक में लगातार कई फिल्मों की असफलताओं ने भारत भूषण को आर्थिक किल्लतों में फंसा दिया। क्योंकि उनके द्वारा निर्माण की गई कई फिल्में लगातार धाराशायी होती गईं। बढ़ते कर्जे के चलते उन्हें अपना शानदार बंगला अपने दोस्त राजेन्द्र कुमार को बेचना पड़ा। यह वही बंगला है जो बाद में राजेन्द्र कुमार ने मजबूरी में राजेश खन्ना को बेचा। भारत भूषण ने जहां कामयाबी का शिखर चूमा, शाही व ठाठ बाट की जिंदगी जी, वहीं अपनी ढलती उम्र में गरीबी के कड़वे घूंट भी पिए। भारत भूषण कहते थे, मुझे उस वक्त सबसे ज्यादा तकलीफ हुई, जब एक प्रोड्यूसर ने मुझसे कहा कि मेरी फिल्म में एक छोटा सा रोल है जूनियर आर्टिस्ट का, अगर तुम करना चाहते हो तो कर लो। मजबूरी में मैंने वो रोल किया सिर्फ एक वक्त की रोटी के लिए। भारत भूषण आखिरी दिनों में बहुत ज्यादा बीमार हो गए थे। इलाज के लिए भी पैसे नहीं होते थे।

अस्सी के दशक में नौबत यहां तक आ गई कि उन्हें मामूली से मामूली रोल ही मिलते थे। जब निर्माताओं को किसी दुखी बाप, डाक्टर, वकील की छोटी सी भूमिका निभाने वाले कलाकार की जरूरत होती वे भारत भूषण को याद कर लेते। इस बीच भारत भूषण की माली हालत बिगड़ती चली गई और फिल्मों में भी उन्हें काम मिलना लगभग बंद हो गया तब उन्होंने छोटे पर्दे की ओर रूख कर लिया और दिशा एवं बेचारे गुप्ताजी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। फिल्मों में काम कम मिल रहा था, जवान बेटी का बोझ, उसकी मानसिक दशा ने भारत भूषण को अंदर तक तोड़ दिया।

उनकी पत्नी रत्ना फिल्मों व सीरियलों में छोटे छोटे रोल करके घर का गुजारा कर रही थीं। भारत भूषण अब बॉलीवुड में गुमनाम हो चले थे। पत्नी रत्ना जैसे-तैसे करके घर का खर्चा चला रही थीं। ऊपर से भारत भूषण बीमार थे। लेकिन अफसोस कि न तो कोई इलाज करवाने वाला था और न ही कोई उनकी अर्थी उठाने वाला। भारत भूषण ने जितना कमाया था वो सब गंवा दिया। उनके बंगले बिक गए, कारें बिक गईं, फिर भी वो कहते रहे मुझे कोई तकलीफ नहीं। लेकिन जब एक दिन उन्हें अपनी लाइब्रेरी की किताबें रद्दी के भाव बेचनी पड़ीं तो वो तड़प उठे। फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर ये साबित हो गया कि यहां सिर्फ उगते सूरज को सलाम किया जाता है।

अपनी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने जिस दुखी व मायूस संगीतकार व गायक का किरदार अदा किया, उसे सदा के लिए अमर कर दिया। उनके निभाए ऐतिहासिक व पौराणिक किरदारों को उन्होंने पर्दे पर खुद ही जीकर दिखाया। वे न तो मेथड एक्टर थे, न ही रोमांटिक या एक्शन हीरो। मगर वे ऐतिहासिक अभिनेता बने और सिनेपटल पर खुद को बेजोड़ साबित किया। एक शाही जीवन जीने वाला यह महान कलाकार वक्त की ठोकर और बॉलीवुड की बेरुखी के चलते बाद में मुंबई की चॉल में रहने को भी मजबूर हुआ। भारत भूषण ने अपने आखिरी वक्त में कहा था- ”मौत तो सबको आती है, लेकिन जीना सबको नहीं आता। और मुझे तो बिल्कुल नहीं आया।” 27 जनवरी, 1992 को भारत भूषण ने अपनी आखिरी सांस ली।

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