K M Cariappa Death Anniversary: अपने युद्धबंदी बेटे नंदा करिअप्पा को छुड़वाने से इनकार कर दिया था

death anniversary of field marshal k m cariappa, field marshal k m cariappa, air marshal k c cariappa, indian army, के एम करिअप्पा, के सी करिअप्पा, kc kariappa, km kariappa, km cariappa, के एम करियप्पा, k m cariappa biography, km cariappa son, k m cariappa quotes, nalini cariappa,general cariappa in kannada,k cariappa, general ks thimayya, muthu machia, sam manek shaw, sirf sach, sirfsach.in

K M Cariappa Death Anniversary: कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा स्वतंत्र भारत की सेना के ‘प्रथम कमांडर इन चीफ़’ थे। इनका जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कुर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर हुआ था। इस स्थान को अब ‘कुडसुग’ नाम से जाना जाता है। उनके पिता कोडंडेरा माडिकेरी में एक राजस्व अधिकारी थे। वह अपने परिवार के साथ लाइम कॉटेज में रहा करते थे। करिअप्पा के तीन भाई तथा दो बहनें भी थीं। इन्हें घर के सभी लोग प्यार से ‘चिम्मा’ कहकर पुकारते थे। इन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा ‘सेंट्रल हाई स्कूल, मडिकेरी’ से प्राप्त की थी। आगे की शिक्षा मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से पूरी की। वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे, किन्तु गणित, चित्रकला उनके प्रिय विषय थे। फुर्सत के क्षणों में वह प्रायः कैरीकेचर बनाया करते थे। 1917 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इसी वर्ष उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश ले लिया।

कॉलेज जीवन में प्राध्यापक डब्लू.एच. विट्वर्थ व अध्यापक एस.आई. स्ट्रीले का करिअप्पा पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनके मार्गदर्शन में करिअप्पा का किताबों के प्रति लगाव बढ़ता गया। एक होनहार छात्र के साथ-साथ वह क्रिकेट, हॉकी, टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी रहे। संगीत सुनना भी उन्हें बेहद पसंद था। शिक्षा पूरी करने के बाद ही प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918 ई.) के लिए उनका चयन सेना में हो गया। सेना में कमीशन पाने वाले प्रथम भारतीयों में वे भी शामिल थे। वह यूनाइटेड किंगडम स्थ‍ित कैम्बर्ले के इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में ट्रेनिंग लेने वाले भी पहले भारतीय थे। करिअप्पा का सम्बन्ध राजपूत रेजीमेन्ट से था। अनेक मोर्चों पर उन्होंने भारतीय सेना का पूरी तरह से सफल नेतृत्व किया था। स्वतंत्रता से पहले ही ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सेना में ‘डिप्टी चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़’ के पद पर नियुक्त कर दिया था। किसी भी भारतीय के लिए यह एक बहुत बड़ा सम्मान था। भारत के विभाजन के समय उन्हें सेना के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गयी जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा, न्यायोचित और सौहार्दपूर्ण तरीके से पूरा किया।

करिअप्पा ने 15 जनवरी, 1949 को जनरल के रूप में पद ग्रहण किया था। इसके बाद से ही 15 जनवरी को ‘सेना दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। अपनी अभूतपूर्व योग्यता और नेतृत्व के गुणों के कारण करिअप्पा बराबर प्रमोट होते रहे। भारत के स्वतंत्र होने पर 1949 में करिअप्पा को ‘कमाण्डर इन चीफ़’ बनाया गया था। इस पद पर वे 1953 तक रहे। सेना से सेवानिवृत्त होने पर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में भारत के ‘हाई-कमिश्नर’ के पद पर भी काम किया। जहां उन्होंने 1956 तक अपनी सेवाएं दीं। इस पद से सेवानिवृत्त होने पर भी करिअप्पा सार्वजनिक जीवन में सदा सक्रिय रहते थे। एक वरिष्ठ अनुभवी अधिकारी के नाते उन्होंने कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी सहायता की। उन्होंने चीन, जापान, अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और कई और यूरोपिय देशों की यात्रा की। अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ़ द चीफ कमांडर ऑफ़ द लीजन ऑफ़ मेरिट’ से सम्मानित किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, बर्मा में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘ऑर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर’ भी दिया गया।

देश की आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने एक मीटिंग की। जिसमें सारे नेता और आर्मी ऑफिसर मौजूद थे। मीटिंग इस बात के लिए थी कि किसे आर्मी चीफ बनाया जाए। पंडित नेहरू ने कहा कि मैं समझता हूं कि हमें किसी अंग्रेज़ को इंडियन आर्मी का चीफ बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पास सेना को लीड करने का एक्सपीरियंस नहीं है। सभी ने नेहरू का समर्थन किया। क्योंकि किसी में भी नेहरू जी का विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। लेकिन अचानक एक आवाज आई ‘मैं कुछ कहना चाहता हूं…।’ पंडित नेहरू ने कहा कि आप जो कहना चाहते हैं वो कहिए। उस व्यक्ति ने कहा, हमारे पास तो देश को भी लीड करने का एक्सपीरियंस नहीं है, तो क्यों न हम किसी ब्रिटिश को भारत का प्रधानमंत्री बना दें? सभी लोग शांत हो गए। नेहरू ने पूछा कि क्या आप इंडियन आर्मी के पहले जनरल बनने को तैयार हैं। उस इंसान को एक बहुत अच्छा मौका मिला था कि वो चीफ बनते लेकिन उन्होंने कहा कि सर हमारे बीच में एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसको बनाया जा सकता है। उनका नाम है लेफ्टिनेंट जनरल करियप्पा। वह आर्मी ऑफिसर जिसने यह बात कही थी, उनका नाम था लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर।

एक और किस्सा है फिल्ड मार्शल करियप्पा से जुड़ा हुआ। साल 1947 में, कश्मीर में एक युद्ध चल रहा था और इसके चलते, यहां के कुछ गांवों में गंभीर भूखमरी की स्थिति पैदा हो गयी थी। उसी दौर में एक बार करिअप्पा उरी में कुछ आक्रमणकारियों का पीछा कर रहे थे। रास्ते में उन्हें बारामूला के एक जनसमूह ने रोक लिया और अपने हालातों के बारे में उन्हें बताने लगे। इन आम लोगों को मदद का आश्वासन देकर, करिअप्पा उस समय आगे बढ़ गए। पर अगले ही दिन, उन्होंने अपने वादे को पूरा किया। वे उस गांव में आटा, चावल और दाल आदि ले कर पहुंचे और ज़रूरतमंद परिवारों में बांट दिया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि बाकी सभी गांवों में भी राशन पहुंचाया जाए, जहां भी लोग भूखमरी से पीड़ित थे। उनकी इस नेकदिल पहल ने 19वीं इन्फैंट्री डिवीजन का नेतृत्व करने वाले भारतीय सैन्य अधिकारी, के. एस थिमय्या को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। बाद में, बारामूला के लोगों ने करिअप्पा के नाम पर एक पार्क का नाम रखा। यह पार्क आज भी वहां है।

साल 1965 में भारत- पाक युद्ध के दौरान करिअप्पा के बेटे, फ्लाइट लेफ्टिनेंट के सी करिअप्पा को पकिस्तान द्वारा कैदी बना लिया गया था। रेडियो पाकिस्तान ने तुरंत ऐलान किया कि नंदा पाक सेना के कब्जे में हैं और पूरी तरह सुरक्षित हैं। तब पूर्व सेना प्रमुख जनरल अयूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। देश के बंटवारे से पहले अयूब खान करियप्पा साहब के अंडर में काम कर चुके थे। अयूब खान ने उनसे संपर्क किया और उनके बेटे को छोड़ने की पेशकश की। यह सुनने पर इस रिटायर्ड आर्मी जनरल ने जवाब दिया, “वह अब मेरा बेटा नहीं है… वह इस देश का बेटा है, एक सैनिक; जो एक सच्चे देशभक्त की तरह अपनी मातृभूमि के लिए लड़ रहा है। आपकी इस नेकदिली के लिए धन्यवाद, पर मेरी आपसे विनती है कि या तो सभी कैदियों को रिहा करें, या फिर किसी को भी नहीं। उसके साथ किसी भी प्रकार का ख़ास बर्ताव करने की आवश्यकता नहीं है।” बाद में अयूब की पत्नी और उनका बड़ा बेटा अख़्तर अयूब उनसे मिलने भी आए।

के एम करिअप्पा के अविस्मरणीय योगदान के लिए 1986 में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय सेना में फील्ड मार्शल के सर्वोच्च सम्मान, फाइव स्टार रैंक से सम्मानित किया। इस सम्मान को पाने वाले दूसरे एकमात्र अधिकारी सैम मानेक शॉ हैं। सेवानिवृत्ति के बाद के एम करिअप्पा कर्नाटक के कोडागु जिले के मदिकेरी में बस गए थे। वे प्रकृति प्रेमी थे। सेवानिवृत्त सैनिकों की समस्याओं का पता लगाकर उनके निवारण के लिए वे सदा प्रयत्नशील रहते थे। 15 मई, 1993 को 94 वर्ष की आयु में करिअप्पा ने बैंगलौर (कर्नाटक) में अंतिम सांस ली।

यह भी पढ़ें: कहानी एवरेस्ट विजेता की, पहले उठाता था दूसरों का सामान

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here