Pulwama Attack: शहादत के एक दिन पहले ही मनाया था 46वां जन्मदिन

martyre naseer

Pulwama Attack: जम्मू में राजौरी के थान्नामंदी तहसील के दोदासन बाला गाँव ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक लंबी लड़ाई लड़ी है। गाँव के लगभग पचास लोगों ने इस संघर्ष में अपनी जान कुर्बान की है। इसी गाँव के रहने वाले नसीर अहमद 14 फरवरी को हुए पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हो गए। नसीर अहमद सीआरपीएफ़ की 76वीं वाहिनी में थे। आतंकियों ने सीआरपीएफ़ के जिस काफ़िले को निशाना बनाया था नसीर अहमद वहां कमांडर के तौर पर तैनात थे।

नसीर अहमद के माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। इनके बड़े भाई सिराजुद्दीन ने इनको पाल-पोष कर बड़ा किया था। सिराजुद्दीन खुद जम्मू-कश्मीर पुलिस में सेवारत हैं और जम्मू में तैनात हैं। नसीर अहमद के अंदर शुरू से ही देशभक्ति की भावना भरी थी। यही वजह थी कि वे सेना में भर्ती हुए थे। बड़े भाई सिराजुद्दीन की चाहत थी कि नसीर सेना में न जाए क्योंकि घर में पहले से ही एक भाई वर्दी वाली नौकरी कर रहा है। पर नसीर के अंदर देशप्रेम की ललक थी। वे देश की सेवा करना चाहते थे इसलिए उन्होंने सीआरपीएफ जॉइन की।

जिस दिन ये आतंकी हमला हुआ, उस दिन नसीर अहमद की तबीयत ख़राब थी। उन्हें तेज़ बुखार था। बड़े भाई सिराजुद्दीन ने नसीर को फ़ोन पर कहा था की छुट्टी ले लो और थोड़ा आराम कर लो। लेकिन नसीर अहमद ने अपनी ड्यूटी को अपना फ़र्ज़ समझा और बुखार की हालत में ही कश्मीर घाटी जाने को तैयार हो गए। नसीर और इनके परिवार को क्या पता था कि वे एक ऐसे सफ़र पर जा रहे हैं जहाँ से कभी वापस लौट कर नहीं आ पाएंगे।

नसीर अहमद की शहादत की ख़बर सुनकर पूरे परिवार में सन्नाटा पसरा हुआ है। बीवी शजिया कौसर का रो-रो कर बुरा हाल है। घर पर लोगों की भीड़ लगी है। हर कोई इस ग़म में शरीक होकर परिवार को सांत्वना दे रहा है। बेटी फलक और बेटे काशिफ़ को कुछ समझ नहीं आ रहा है। दोनों अपने पापा के वापस लौट आने की राह देख रहे हैं। तक़दीर का फैसला देखिए कि एक तरफ़ नसीर ख़ुद बचपन में अनाथ हुए थे। तो दूसरी तरफ़ इनके दोनों बच्चे भी आज अनाथ हो गए।

शहादत से एक दिन पहले 13 फरवरी को नसीर ने अपना 46वां जन्मदिन मनाया था, पर इन्हें क्या पता था कि ये इनका आख़िरी जन्मदिन होगा।

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