‘दंतेश्वरी दल’ से कांपते हैं नक्सली, इन महिला कमांडो की बहादुरी के किस्से हैं मशहूर

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इनके खौफ ने खूंखार नक्सलियों की नींद हराम कर दी है। खास वर्दी वाली इन महिलाओं को देख कर नक्सली अपने बिल में दुबक जाते हैं। कायर नक्सलियों में हिम्मत नहीं होती कि वो सामने आकर इन बहादुर महिलाओं का सामना कर सकें। इसलिए इन महिलाओं को नक्सलियों का काल भी कहा जाता है। आज हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ पुलिस में शामिल उन महिला कमांडो की जिनके नाम से नक्सली थर्र-थर्र कांपते हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में ये महिला कमांडो घने जंगलों में खूंखार से खूंखार नक्सलियों से बेधड़क होकर लोहा ले रही हैं। दरअसल, दंतेवाड़ा पुलिस ने ‘दंतेश्वरी लड़ाके’ दल का गठन किया है। यह राज्य की पहली महिला डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) की टीम है। राज्य के धुर नक्सल प्रभावित इलाके में ये महिला कमांडो डीआरजी के लड़ाकों का साथ दे रही हैं। राज्य के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा कार्यों के लिहाज से डीआरजी को सबसे बेहतर माना जाता है। यह दल स्थानीय युवा और आत्मसमर्पित नक्सलियों को खास ट्रेनिंग देकर बनाया गया है। क्योंकि ये इन्हीं क्षेत्रों के मूल निवासी हैं, इसलिए यहां के चप्पे-चप्पे से पूरी तरह वाकिफ हैं।

डीआरजी ने पिछले कुछ सालों में नक्सल विरोधी कई अभियानों में सफलता पाई है और वर्तमान समय में यह दल अब नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबल का एक बड़ा हथियार साबित हो रहा है। डीआरजी का उद्देश्य माओवादी हिंसा को जड़ से उखाड़ फेंकना है। ‘दंतेश्वरी लड़ाके’ दल में शामिल महिला कमांडो जितनी खास हैं उतनी ही खास है इस दल का नाम दंतेश्वरी देवी के नाम पर रखे जाने के पीछे की कहानी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 380 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित है मशहूर दंतेश्वरी माता का मंदिर। नक्सली इलाके में घोर जंगल और पहाड़ों के बीच स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर 137 साल पुराना है और 32 खंभों पर टिका है। यह मान्यता है कि दंतेश्वरी माई इस क्षेत्र के लोगों की रक्षा करती हैं। इसलिए, दंतेश्वरी देवी के नाम से ही जिला पुलिस ने महिला डीआरजी की टीम का गठन किया।

दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव के अनुसार, दंतेवाड़ा पुलिस की महिला कमांडो ‘दंतेश्वरी लड़ाके’, पुरुष कमांडो के साथ मिलकर नक्सल विरोधी अभियान को बखूबी अंजाम दे रही हैं। यह राज्य का पहला डीआरजी प्लाटून है जिसमें सभी महिलाएं हैं। इसमें शामिल 30 महिलाओं में से 10 आत्मसमर्पण कर चुकी महिला नक्सली हैं जो माओवादियों की पत्नी हैं। वहीं, 10 महिला कमांडो सहायक आरक्षक हैं। सरेंडर कर चुकी ये महिलाएं पहले सलवा जुडूम आंदोलन का हिस्सा थीं। यूं तो इस दल में शामिल सभी महिला कमांडो का कोई सानी नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बीहड़ों में ‘ट्रिपल वुमन पावर’ की हमेशा चर्चा होती है। इनकी बहादुरी के बारे में कहा जाता है कि अगर यह तीनों एक साथ बंदूक उठा लें तो वो 30 पर भी भारी पड़ जाएं। एक वक्त था जब यह ‘ट्रिपल वुमन पावर’ यानी कोसी, फुलो और प्रोमिला खूंखार नक्सली थीं।

साल 2015 में इन तीनों ने पुलिस के सामने हथियार डाल दिया। अगले ही साल यानी 2016 में एक एंटी-नक्सल अभियान में डीआरजी की इन्हीं तीनों महिला कमांडो ने मिलकर 2 नक्सलियों को मार गिराया। उस वक्त यह तीनों डीआरजी की असिस्टेंट कॉन्सटेबल थीं। बस्तर में यह पहली बार था, जब महिला कमांडोज ने एंटी नक्सल ऑपरेशन में पुलिस का साथ दिया और सिर्फ साथ ही नहीं दिया बल्कि दो नक्सलियों का काम तमाम किया तथा नक्सलियों के दिलों में अपने नाम का खौफ भर दिया। ऐसी ही महिलाओं की क्षमता के देखते हुए अब राज्य में बकायदा महिला डीआरजी कमांडो की टीम बनाई गई है। जानकारी के मुताबिक दंतेवाड़ा में नक्सलियों के दांत खट्टे करने के लिए डीआरजी के पांच प्लाटून हैं और अब यह छठी प्लाटून महिलाओं की है। इस प्लाटून का नेतृत्व पुलिस उपअधीक्षक (डीएसपी) दिनेश्वरी नंद कर रही हैं।

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