जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की 100वीं बरसी, उन 5 दिनों की पूरी कहानी…

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आज जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jaliwalan Bagh Massacre) की 100वीं बरसी है। इस मौके पर हम आपको ले चलते हैं अतीत की उन गलियों में जिनसे बहुत कम ही लोग परिचित होंगे। ठीक सौ साल पहले आज ही के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में वो दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी जिसे इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है। इस हत्याकांड को अंजाम तो दिया गया था देश में आजादी के लिए चल रहे आंदलोन को रोकने के लिए, क्रांतिकारियों में डर और दहशत पैदा करने के लिए, लेकिन इस हत्याकांड के बाद हुआ ठीक इसका उलटा। क्रांतिकारियों के दिल में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आक्रोश और भर गया, इरादे पहले से ज्यादा मजबूत हो गए और फिर क्रांति की ज्वाला कुछ ऐसी धधकी कि ब्रितानिया हुकूमत की नींव हिल गई।

साल 1919 में हमारे देश में कई तरह के कानून, ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए थे और इन कानूनों का विरोध हमारे देश के हर हिस्से में किया जा रहा था। 6 फरवरी, साल 1919 को ब्रिटिश सरकार ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक ‘रॉलेक्ट’ नामक बिल को पेश किया जिसे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने मार्च के महीने में पास कर दिया था, जिसके बाद ये बिल एक अधिनियम बन गया था।

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जलियांवाला बाग़ का गेट

इस अधिनियम के अनुसार भारत पर राज कर रही ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को देशद्रोह के शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और उस व्यक्ति को बिना किसी जूरी के सामने पेश किए जेल में डाल सकती थी। इसके अलावा पुलिस दो साल तक बिना किसी भी जांच के, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में भी रख सकती थी। इस अधिनियम ने भारत में हो रही राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए, ब्रिटिश सरकार को एक ताकत दे दी थी।

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इस अधिनियम की मदद से भारत की ब्रिटिश सरकार, भारतीय क्रांतिकारियों पर काबू पाना चाहती थी और हमारे देश की आजादी के लिए चल रहे आंदोलनों को पूरी तरह से खत्म करना चाहती थी। इस अधिनियम का महात्मा गांधी समेत तमाम नेताओं ने विरोध किया था। गांधी जी ने इसी अधिनियम के विरुद्ध देश भर में ‘सत्याग्रह’ आंदोलन शुरू कर दिया था। इसी सिलसिले में अमृतसर में भी 6 अप्रैल, 1919  को इस आंदोलन के तहत एक हड़ताल की गई थी, मकसद था रॉलेक्ट एक्ट का विरोध।

अमृतसर में इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे कांग्रेस नेता डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल। इन दोनों का मानना था कि अगर हिंदुस्तान के हिंदू और मुसलमान एक साथ आ गए तो ब्रितानिया हुकूमत को उखाड़ फेंका जा सकता है। इन दोनों समुदायों को एक साथ लाने के लिए एक योजना बनी। तय पाया गया कि 9 अप्रैल, 1919 को रामनवमी के दिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

 

कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए डॉ. किचलू ने 13 फरवरी, 1919 को शहर के तमाम बड़े मुस्लिम नेताओं से मुलाकात कर उन्हें समझाया कि कैसे अंग्रेजों से लड़ने के लिए दोनों समुदायों का साथ आना जरूरी है। उधर, डॉ. सत्यपाल ने भी शहर के तमाम बड़े हिंदू नेताओं और संगठनों से मिल कर उन्हें साथ आने के लिए तैयार कर लिया था। पूरे शहर में उत्साह का माहौल था। भावनाएं जोर पकड़ने लगी थीं।

इसको देखते हुए डिप्टी कमिश्नर मिल्स इरविंग ने 5 अप्रैल को ही इन दोनों नेताओं के किसी भी सार्वजनिक सभा में भाग लेने पर रोक लगा दी थी। लिहाजा, तय हुआ कि 9 अप्रैल के कार्यक्रम की सदारत महात्मा गांधी की सत्याग्रह सभा के सचिव डॉक्टर हाफिज मुहम्मद बशीर करेंगे।

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9 अप्रैल को डॉक्टर बशीर घोड़े पर चल रहे थे जबकि चौधरी बुग्गा मल और बाकी दूसरे नेता जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। भारी संख्या में लोग इस जुलूस में शामिल हुए थे और नारा लग रहा था- हिंदू मुस्लिम की हुकूमत। जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था।

मशहूर मारवाड़ी नेता महाशा रत्तन चंद और खैरुद्दीन मस्जिद के इमाम गुलाम जिलानी ने मस्जिद के बाहर चबील यानी प्याऊ लगवाया था। जहां हिंदू-मुस्लिम सब एक ही गिलास से पानी पी रहे थे। ब्रिटिश हुकूमत को ये सब रास नहीं आ रहा था। लिहाजा, अगले ही दिन यानी 10 अप्रैल को डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल को चुपके से गिरफ्तार करके कांगड़ा भेज दिया गया। वहां दोनों को नजरबंद कर दिया गया।

बेशक, इनकी गिरफ्तारी चुपके से की गई थी, लेकिन इसकी खबर तुरंत शहर भर में फैल गई। दोनों नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग डिप्टी कमिश्नर के आवास के सामने जमा हो गए और उनकी रिहाई की मांग करने लगे।

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डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल (बाएं से दाएं)

गुस्से से लाल पीले हो रहे अंग्रेज अधिकारी इरविंग और सिविल लाइन्स जेल के इनचार्ज कैप्ट मैसी ने भीड़ पर फायरिंग का आदेश दे दिया। इस फायरिंग में 24 लोगों की जान चली गई जबकि कई जख्मी हो गए। इस कत्लेआम से जनता में रोष फैल गया। शवों को खैरुद्दीन मस्जिद लाया गया जबकि घायलों को अस्पताल भेज दिया गया। अस्पताल में एक अजीब किस्सा पेश आया। एक तो लोग पहले से ही आक्रोशित थे। ऊपर से एक ब्रिटिश नर्स इसाबेल मैरी एसडन ने तंज कस दिया, “English had taught the Indians the right lesson” यानी “अंग्रेजों ने भारतीयों को सही सबक सिखाया”। इसके बाद तो वहां मौजूद बेकाबू भीड़ उस गोरी नर्स का वहीं काम तमाम करने पर अमादा हो गई। बड़ी मुश्किल से दूसरी अंग्रेज महिला ने इस नर्स की जान बचाई। इतना ही नहीं, उग्र भीड़ ने सिटी मिशन स्कूल की मैनेजर मार्सेला शेरवुड पर भी जानलेवा हमला कर दिया, जिसकी जान एक भारतीय डॉक्टर ने बचाई।

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एक के बाद एक हुई घटनाओं से शहर का पारा बढ़ गया था। शाम होते-होते भीड़ ने तीन अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। रेलवे स्टेशन, तार विभाग सहित कई सरकारी दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया। तार विभाग में आग लगाने से सरकारी कामकाज को काफी नुकसान पहुंचा था, क्योंकि इसी के माध्यम से उस वक्त अफसरों के बीच संचार हो पाता था। इन घटनाक्रमों से ब्रिटिश सरकार काफी खफा थी।

अमृतसर के बिगड़ते हालातों पर काबू पाने के लिए भारतीय ब्रिटिश सरकार ने इस राज्य की जिम्मेदारी डिप्टी कमिश्नर मिल्स इरविंग से लेकर ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच डायर को सौंप दी थी। डायर को पोस्टिंग के साथ प्रमोशन देकर जनरल बना दिया गया था। पंजाब के हालात को देखते हुए राज्य के कई शहरों में ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया। इस कानून के तहत नागरिकों की स्वतंत्रता पर और सार्वजनिक समारोहों का आयोजन करने पर प्रतिबंध लग गया था। जहां पर भी तीन से ज्यादा लोगों को इकट्ठा पाया जा रहा था, उन्हें पकड़कर जेल में डाला दिया जा रहा था। दरअसल, इस लॉ के जरिए ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों द्वारा आयोजित की जीने वाली सभाओं पर रोक लगाना चाहती थी ताकि क्रांतिकारी उनके खिलाफ कुछ ना कर सकें।

उधर, 11 अप्रैल की सुबह खैरुद्दीन मस्जिद में दंगों में मारे गए लोगों का अंतिम संस्कार किया गया।

12 अप्रैल को सरकार ने अमृतसर के अन्य दो नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया था। इनके नाम थे चौधरी बुगा मल और महाशा रतन चंद। इन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अमृतसर के लोगों का गुस्सा और बढ़ गया। जिसके कारण शहर के हालात और बिगड़ने की संभावना थी। हालात संभालने के लिए ब्रिटिश पुलिस ने शहर में और सख्ती बढ़ा दी।

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अगले दिन यानी 13 अप्रैल को सिखों का अहम पर्व बैसाखी था। शहर में तमाम तरह की सख्ती और कर्फ्यू के बावजूद हजारों की संख्या में लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे। इनकी संख्या करीब 20 हजार से भी ज्यादा थी। मकसद था, नेताओं की गिरफ्तारी का शांतिपूर्ण विरोध। जनरल डायर को इस शांति सभा की सूचना मिल चुकी थी।

चूंकि जालियांवाला बाग, स्वर्ण मंदिर के पास ही था। लिहाजा, तमाम लोग घूमने के लिए अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे थे। और फिर अचानक मौत की आंधी ने दस्तक दे दी।

शाम करीब 4 बजे जनरल डायर 150 सिपाहियों के साथ बाग के लिए रवाना हो गया। डायर को इस बात का डर था कि कहीं इस सभा के जरिए दंगे ना फैल जाएं। लिहाजा, डायर ने बाग में पहुंचने के बाद लोगों को बिना कोई चेतावनी दिए, सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। कहा जाता है कि इन सिपाहियों ने करीब 10 मिनट तक गोलियां चलाई थी। उनके हाथ तभी रुके जब उनकी गोलियां खत्म हुईं। इस बीच उन्होंने कुल 1650 गोलियां दागी थीं। मानो गोलियों की बारिश हो रही हो। बचने के लिए लोग भागने लगे, लेकिन डायर ने सारे गेट बंद करवा दिए थे। बाग की दीवारें बहुत ऊंची थीं जिन्हें पार कर पाना आसान नहीं था। कुछ लोगों को तो दीवार चढ़ते वक्त ही गोलियां लगीं। कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए बाग में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। चंद मिनटों में ही जालियांवाला बाग की पूरी जमीन खून से सन गई थी।

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ब्रिटिश सरकार के अनुसार इस फायरिंग में लगभग 379 लोगों की जान गई थी और 1,200 लोग ज़ख्‍मी हुए थे। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुताबिक उस दिन 1,000 से ज़्यादा लोग शहीद हुए थे। जिनमें से 120 की लाशें तो कुएं में से मिली थीं और 1,500 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए थे।

हत्याकांड के दो दिन बाद मार्शल लॉ लगा दिया गया। रामनवमी के जुलूस में भाग लेने वाले सभी हिंदू और मुस्लिम नेताओं के साथ ब्रिटिश हुकूमत बड़ी बर्बरता के साथ पेश आई। डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल को काला पानी की सजा के लिए अंडमान भेज दिया गया। जबकि डॉ. हाफीज मोहम्मद बशीर को फांसी की सजा दी गई।

16 अप्रैल को इमाम गुलाम जिलानी को नमाज पढ़ते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें इतनी बुरी तरह टॉर्चर किया गया कि उनकी मौत हो गई। एक चश्मदीद के मुताबिक, पुलिस अधिकारी इमाम जिलानी से जबरन डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल के खिलाफ बयान दिलवाना चाहते थे। पर वो नहीं माने और शहादत दे दी।

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जनरल डायर को लगा था कि इस हत्‍याकांड के बाद भारतीय डर जाएंगे, लेकिन इसके ठीक उलट ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पूरा देश आंदोलित हो उठा। आगे चलकर ये हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस नरसंहार की पूरी दुनिया में आलोचना हुई। आखिरकार, दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट एडविन मॉन्टेग्यू ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया। कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद डायर को डिमोट कर कर्नल बना दिया गया। साथ ही उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया गया।

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शहीद ऊधम सिंह

फिर, जलियांवाला बाग हत्‍याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह लंदन गए। वहां उन्‍होंने कैक्स्टन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। ऊधम सिंह को 31 जुलाई, 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर का नाम उन्‍हीं के नाम पर रखा गया है।

देखेंः जलियांवाला बाग हत्याकांड की पूरी कहानी

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