फिल्मों में नायक बनना चाहते थे हरीश, शहादत देकर बन गए असल जिंदगी के महानायक

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छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में भोपाल के जवान हरीश चंद्र पाल शहीद हो गए थे। वह सीआरपीएफ की 211 वीं बटालियन में हवलदार थे। खल्लारी थाना क्षेत्र में सीआरपीएफ के दल के सर्च ऑपरेशन पर जाते समय हरीश ने अपनी पत्नी से आखिरी बार बात की थी।

घर के हालचाल पूछने के बाद उन्होंने पत्नी से कहा था कि वह दो दिन बात नहीं कर पाएंगे। 5 अप्रैल सुबह 11 बजे जवान के परिवार को उनकी शहादत की खबर मिली। 45 साल के हरीश चंद्र पाल भोपाल के एस-10, पीयूष नगर योजना होम्स, अवधपुरी में अपनी पत्नी लक्ष्मी पाल और 12 साल की बेटी मीठी के साथ रहते थे।

शहीद हरीश की पत्नी लक्ष्मी पाल महिला कल्याण विभाग में नौकरी करती हैं। उनकी बेटी मीठी 7 वीं कक्षा में पढ़ती है। वो होली पर छुट्टियां बिताने भोपाल आए थे और 27 मार्च को ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए रायपुर निकल गए थे। सीआरपीएफ के शहीद जवान हरीश का बचपन पुराने शहर के जहांगीराबाद के बरखेड़ी में बीता था।

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उनके पिता स्व. दशाराम पाल लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी में नौकरी करते थे। उनका परिवार मूल रूप से यूपी के प्रतापगढ़ का रहने वाला है। उनके परिवार में उनके बड़े भाई फूलचंद्र पाल हैं, जो पैतृक गांव में खेती करते हैं। उसके बाद उनकी बहन उर्मिला पाल चंडीगढ़ हरियाणा में अपने पति के साथ रहती है। भाई-बहनों में हरीश तीसरे नंबर के थे।

हरीश के एक छोटे भाई चंद्र पाल हैं। पिता की मृत्यु के बाद पीएचई विभाग में अनुकंपा पर चंद्र पाल को नियुक्ति मिल गई थी। हरीश सीआरपीएफ में भोपाल में ही भर्ती हुए थे। लेकिन कभी भी भोपाल में उनकी पोस्टिंग नहीं हुई। वह दिल्ली, असम, रायपुर, जम्मू में पोस्टेड रहे। पिछले चार साल से वे छत्तीसगढ़ में तैनात थे। दो साल से वे अनिवार्य सेवानिवृत्ति की कोशिश कर रहे थे।

पर उनकी कार्यशैली को देखकर सीआरपीएफ ने उनकी एप्लीकेशन को लंबित रखा हुआ था।हरीश अभिनय करना चाहते थे। सीआरपीएफ में भर्ती होने से पहले वे मुंबई भी गए थे। जहां उन्होंने अभिनेता बनने के लिए काफी संघर्ष किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए थे। इसके बाद पिता के कहने पर वो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने लगे थे।

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जिसमें उनको सफलता मिली और सीआरपीएफ में चुन लिए गए। जलेबी उन्हें बहुत पसंद थी। वह अपने घर के पास एक जलेबी की दुकान पर जलेबी खाने जाते थे। वह छुट्टियों में जब भी घर आते, वहां जलेबी खाने जरूर जाते थे। हरीश के छोटे भाई बताते हैं कि नेहरू नगर, अवधपुरी से काफी दूर है। इसलिए उनसे कम मुलाकत होती थी।

पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई गांव में रहते थे। एक साल से मां की तबियत खराब रहती है। उनको पैरालाइसिस है। गांव के काम और जमीन को लेकर वो भाई से हमेशा बात करते थे। कहते थे कि परिवार में कोई कमी मत होने देना। पैसों की जरूरत हो तो मांग लिया करो।इस बार छुटि्यों में बेटी और पत्नी को साथ लेकर वह वैष्णोदवी के दर्शन के  लिए गए थे। वहां से वह वाघा बार्डर घूमने निकल गए थे। वो पत्नी से अपनी बेटी को लेकर हमेशा बात किया करते थे। अपनी बेटी को वे डॉक्टर बनाना चाहते थे।

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