पुलवामा हमलाः जोश जरूरी है पर होश नहीं गंवाना है

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पुलवामा (Pulwama) हमले के बाद देश में आक्रोश की लहर है। 26/11 हमले के बाद से किंचित पहली बार देश में ऐसा मंजर देखने को मिल रहा है। कमोबेश ये वैसा ही दर्द है जिसे हमने एक दशक पहले झेला था। दर्द, गुस्सा और बदले की भावना बलवती होने लगी है। झुंझलाहट बढ़ गई है। हताशा, निराशा और हार जाने का भाव कहीं गहरे तक पैबस्त होने लगा है। एक राष्ट्र के तौर पर हम निस्तेज और असहाय महसूस कर रहे हैं।

टीवी चैनल और सोशल मीडिया लगातार भावनाओं को भड़काने में लगे हैं। सरकार को बदले की कार्रवाई के लिए उकसा रहे हैं। पेशे-ए-मंज़र और भौगोलिक हालात की मामूली समझ रखने वाले विशेषज्ञ, विश्लेषक और एंकर सरकार को निर्णायक कदम उठाने और जैश ए मोहम्मद जैसे संगठनों तथा रावलपिंडी में बैठे उनके आकाओं को सबक सिखाने की नसीहत दे रहे हैं। एक ऐसा सबक जिसे उनकी सात पुश्तें याद रखें। आंख के बदले आंख और सिर के बदले सिर की तर्ज पर कार्रवाई करने की मांग करने वाले इन विशेषज्ञों के पास कई तरह के विकल्प हैं। इनमें आतंकी कैंपों पर हमला, आतंक के आकाओं का खात्मा करने के लिए कमांडो ऑपरेशन और आर-पार की जंग शामिल है। एक बेहद छोटा अतिवादी फिरका ऐसा भी है, जो निर्णायक जंग की मांग कर रहा है। मतलब, पाकिस्तान पर परमाणु हमला!

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इस दर्द से हम पहले भी गुजर चुके हैं। ऐसा ही आक्रोश संसद हमले और मुंबई हमले के बाद भी सामने आया था। दोनों ही मौकों पर, खासतौर से संसद हमले के बाद दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी मुल्क कमोबेश जंग की कगार पर आ गए थे। गनीमत है कि समझदारी के चलते एक बड़ी तबाही होते-होते टल गई। सुरक्षा मामलों की कैबिनेटी कमेटी ने शुक्रवार सुबह मीटिंग करके हालात का जायजा लिया। गनमीत है कि उसमें मूर्खतापूर्ण कट्टर राष्ट्रवाद, जंग को लेकर बयानबाजी और ललकारने जैसी बातें नहीं हुईं। पाकिस्तान के हाई कमिश्नर को तलब किया गया और पाकिस्तान का मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा छीन लिया गया। हालांकि, MFN बस एक छलावा ही है। क्या आप मानेंगे कि पुलवामा हमले (Pulwama attack) से पहले पाकिस्तान हमारा मोस्ट फेवर्ड नेशन था! एक लाइन में कहा जाए, तो सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने समझदारी का परिचय दिया और दुख की इस घड़ी में सभी मुख्य राजनीतिक दलों ने सरकार के साथ एकजुटता दिखाई। यही सही तरीका है।

इसका मतलब ये कतई नहीं है कि पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को वैसे ही रखा जाए जैसे कल तक थे। हमें कार्रवाई करनी चाहिए। ताकत और शौर्य का इस्तेमाल करके कार्रवाई करनी चाहिए। पुलवामा (Pulwama) के गुनहगारों को ऐसी सजा देनी चाहिए जो नजीर बन जाए। लेकिन हमें क्षणिक आवेश में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। इसका मतलब तो ये होगा कि हम दुश्मन के इशारे पर नाच रहे हैं। बदले की कार्रवाई का समय और तरीका सोच समझ कर तय किया जाना चाहिए क्योंकि इसकी कामयाबी के लिए इसका यकायक होना बेहद अहम है। पुनश्च, जब तक सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाती है, तब तक ऐसे हालात में कार्रवाई का ताना-बाना व्यवस्थित हो जाना चाहिए। जरूरत है कि भारत विश्व समुदाय को अपने पक्ष में लाए। द्विपक्षीय संबंधों में राजनयिक संबंधों को घटाने, कारोबारी रिश्तों को सीमित करने और कॉमर्शियल फ्लाइट्स के लिए पाकिस्तान को अपना एयरस्पेस देने से रोकने जैसे विकल्प शामिल हैं।

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घरेलू तौर पर बात करें तो हमें कश्मीर घाटी में किसी भी तरह के कोलैटरल नुकसान को रोकने की जरुरत है। साथ ही, हमें अपनी आंतरिक सुरक्षा और इंटेलिजेंस एजेंसियों की सिरे से समीक्षा करने की भी जरुरत है। यह आलोचना और आरोप-प्रत्यारोप का वक्त नहीं है लेकिन इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि 350 किलो विस्फोटक लिए एक कार इतनी आसानी से हमारे सुरक्षा जवानों से भरे बस को टक्कर मार दे।

अंत में, पिछले कुछ हफ्तों से देश भर में ‘हाऊ इज़ द जोश’ तकिया कलाम बन गया है। कहना ये है कि परीक्षा की ऐसी मुश्किल घड़ी में हमें जोश से अधिक अधिक होश की दरकार है!

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